IMG 20260920 WA0002

जंगलों को जिंदगी देने वाले मृदुल पाठक अब खुद जिंदगी के लिए लड़ रहे जंग

गणेश पाण्डेय, भोपाल। जिस आदमी ने पूरी उम्र जंगलों की सांसों को बचाने में लगा दी, आज वह खुद अपनी सांसों के लिए जूझ रहा है। भारतीय वन सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी मृदुल कुमार पाठक फेफड़ों की गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं और उन्हें बचाने का अब सिर्फ एक ही रास्ता बचा है— लंग ट्रांसप्लांट। जिस शख्स ने कभी बाघों की दहाड़ में जंगल की धड़कन सुनी थी, आज वही खुद हर सांस के लिए मशीनों पर निर्भर है।

मध्यप्रदेश राज्य वन सेवा से करियर शुरू करने वाले मृदुल कुमार पाठक बाद में भारतीय वन सेवा में आए और दशकों तक प्रदेश के जंगलों व वन्यजीवों की सेवा में जुटे रहे। उमरिया के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व जैसे देश के अहम बाघ संरक्षण क्षेत्र में फील्ड डायरेक्टर रहते हुए उन्होंने वन्यजीव संरक्षण को नई दिशा दी। मार्च 2019 में सेवानिवृत्त होने के बाद जिस जिंदगी को उन्होंने चैन से जीना शुरू किया था, आज वही जिंदगी सबसे बड़ी परीक्षा ले रही है।

IMG 20260920 WA0001

अब लड़ाई जंगल की नहीं, सांसों की है

मृदुल पाठक के फेफड़े अब सामान्य रूप से काम करना बंद कर चुके हैं। हालत इतनी नाजुक है कि उन्हें भोपाल से सामान्य तरीके से यात्रा कराना भी संभव नहीं था। रविवार को उन्हें ECMO सपोर्ट के साथ एयर एम्बुलेंस के जरिए चेन्नई के अपोलो हॉस्पिटल पहुंचाया गया, जहां अभी उनका इलाज चल रहा है। परिवार के मुताबिक डॉक्टरों ने साफ कह दिया है कि उनकी जान बचाने का प्रमुख विकल्प अब फेफड़ों का प्रत्यारोपण ही है। ECMO एक अत्याधुनिक लाइफ-सपोर्ट सिस्टम है, जो शरीर को कृत्रिम रूप से ऑक्सीजन देकर फेफड़ों के थमते काम को कुछ समय के लिए सहारा देता है, लेकिन यह इलाज नहीं, सिर्फ जिंदगी को थामे रखने की एक कोशिश भर है।

डोनर मिलने तक हर दिन उम्मीद का इंतजार

चेन्नई पहुंचने के बाद अब मृदुल पाठक को उपयुक्त डोनर मिलने तक ECMO और गहन चिकित्सा निगरानी में रखा जा रहा है। यह इंतजार कितने दिन, कितने हफ्तों तक खिंचेगा, कोई डॉक्टर तय नहीं बता सकता। और हर बीतता दिन परिवार के लिए एक नई परीक्षा लेकर आता है, क्योंकि हर दिन के साथ इलाज का खर्च भी बढ़ता जा रहा है। परिवार द्वारा साझा किए गए अनुमान के मुताबिक, उपचार, अस्पताल में भर्ती रहने और रिकवरी की पूरी प्रक्रिया मिलाकर कुल खर्च करीब ₹2.75 से 3 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। यह सिर्फ एक अनुमान है, असल खर्च इलाज की अवधि, डोनर मिलने में लगने वाले समय और अन्य चिकित्सकीय जरूरतों के हिसाब से घट-बढ़ सकता है।

एक बेटे की सबसे बड़ी चिंता, एक परिवार की सबसे कठिन घड़ी

आज डॉ. अंकुर पाठक अपने पिता के अस्पताल बिस्तर के पास बैठे हैं, हाथ थामे, हिम्मत बंधाते हुए। लेकिन उनके भीतर एक सवाल लगातार कचोट रहा है, जिसका जवाब अकेले किसी एक परिवार के पास नहीं होता—इतनी बड़ी रकम का इंतजाम आखिर कैसे होगा। परिवार अपनी जमा-पूंजी का बड़ा हिस्सा पहले ही इलाज में खर्च कर चुका है, और आगे की लड़ाई अब अकेले उनके बूते की नहीं रही। ऐसे में परिवार को समाज, मित्रों, सहकर्मियों और उन सभी संवेदनशील लोगों की मदद की दरकार है, जो एक जिंदगी बचाने में साथ खड़े हो सकें।

जिस आदमी ने अपनी पूरी उम्र जंगलों और बेजुबान वन्यजीवों की जिंदगी बचाने में लगा दी, आज उसके लिए किसी जंगल को नहीं, बल्कि एक इंसान की जान को बचाना है। यह अपील सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की जिम्मेदारी बन जाती है, जिसने कभी न कभी जंगल और वन्यजीवों की सुंदरता का आनंद लिया है, जिसे बचाने में मृदुल पाठक जैसे लोगों ने अपनी जिंदगी खपाई। इस अपील को अधिक से अधिक साझा कीजिए, और संभव हो तो मदद का हाथ जरूर बढ़ाइए।