वन भवन भोपाल

प्रोटोकॉल तोड़ने के आरोप, स्टेनो के इनपुट पर सीनियर अधिकारी को लिखा पत्र

गणेश पाण्डेय, भोपाल। राज्य के वन मुख्यालय में इन दिनों एक पत्र को लेकर शीर्ष वन अधिकारियों के बीच असहजता और चर्चा का माहौल बना हुआ है। पीसीसीएफ (कैंपा) मनोज अग्रवाल द्वारा पीसीसीएफ अनुसंधान एवं विस्तार को भेजा गया एक पत्र अब प्रोटोकॉल और स्थापित प्रशासनिक परंपरा के उल्लंघन के आरोपों में घिर गया है। विवाद की वजह यह है कि यह पत्र कथित तौर पर स्टेनो के मौखिक इनपुट के आधार पर, बिना पुष्टि के, एक सीनियर अधिकारी को भेज दिया गया।

हालांकि यह पत्र करीब 15 दिन पुराना है, लेकिन वन मुख्यालय में अब भी इसे लेकर लंच टाइम चर्चाओं और टी क्लब की बैठकों में लगातार टीका-टिप्पणी हो रही है। वरिष्ठ अधिकारियों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या किसी स्टेनो की सूचना के आधार पर इस तरह सीधे दिशा-निर्देश जारी करना उचित था।

स्टेनो के इनपुट पर उठा सवाल

मुख्यालय में चर्चा है कि कैंपा शाखा के स्टेनो नितिन माथुर शासकीय दौरे पर डिंडोरी गए थे। वहीं से उन्होंने डिंडोरी रोपणी क्षेत्र में सुधारात्मक कार्य की आवश्यकता की जानकारी दी। आरोप है कि इसी जानकारी के आधार पर पीसीसीएफ मनोज अग्रवाल ने बिना विभागीय पुष्टि के सीधे पीसीसीएफ अनुसंधान एवं विस्तार को पत्र जारी कर दिया।

वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि इस तरह का पत्राचार प्रशासनिक अनुशासन और वरिष्ठता क्रम के विपरीत है, खासकर तब जब संबंधित अधिकारी 1992 बैच के वरिष्ठ आईएफएस हों।

पहले भी उठ चुके हैं सवाल

वन महकमे में यह धारणा भी चर्चा में है कि 1993 बैच के आईएफएस मनोज अग्रवाल जिस शाखा में पदस्थ होते हैं, वे अन्य शाखाओं की कार्यप्रणाली में अधिक दखल देते हैं। इससे पहले भी उन्होंने पीसीसीएफ संरक्षण को पत्र लिखा था। उस पत्र का संरक्षण शाखा से कड़े शब्दों में जवाब आया, जिसके बाद मामला अपर मुख्य सचिव (एसीएस) तक पहुंच गया था।

कैंपा की जिम्मेदारी, पर फोकस दूसरी शाखाओं पर?

वर्तमान में मनोज अग्रवाल के पास कैंपा और कार्य योजना जैसे अहम दायित्व हैं। कैंपा शाखा को लेकर पहले से ही वनीकरण क्षतिपूर्ति और वित्तीय गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आती रही हैं। विभागीय हलकों में यह सवाल भी उठ रहा है कि इन शिकायतों के निराकरण के बजाय उनका ध्यान अनुसंधान, संरक्षण और अन्य शाखाओं की कार्यशैली पर अधिक क्यों केंद्रित है।

संरक्षण कार्यकाल पर भी चर्चा

महकमे में यह पहलू भी चर्चा का विषय है कि प्रदेश में सबसे अधिक अवैध कटाई उस समय सामने आई, जब मनोज अग्रवाल के पास संरक्षण शाखा का प्रभार था। होशंगाबाद वन मंडल के छीपीखापा क्षेत्र में करीब ढाई करोड़ रुपये की अवैध कटाई का मामला भी उसी कार्यकाल में उजागर हुआ था।

पीसीसीएफ अनुसंधान का पक्ष

विभाष ठाकुर, पीसीसीएफ (अनुसंधान एवं विस्तार) ने इस पूरे विवाद पर कहा—
“इस संबंध में मुझे कोई जानकारी नहीं है। मैं इस विषय पर कोई चर्चा नहीं करूंगा।”

स्टेनो के इनपुट पर पत्र

मुख्यालय में सवाल यह है कि क्या किसी स्टेनो की रिपोर्ट के आधार पर, बिना तकनीकी पुष्टि, वरिष्ठ अधिकारी को निर्देश देना प्रशासनिक रूप से सही है।

प्रोटोकॉल बनाम अधिकार क्षेत्र

पत्र को वरिष्ठता क्रम और स्थापित विभागीय प्रक्रिया के विपरीत बताया जा रहा है, जिस पर अंदरखाने असहमति साफ दिख रही है।

कैंपा पर लंबित शिकायतें

कैंपा शाखा में पुराने मामलों के निराकरण के बजाय अन्य शाखाओं में हस्तक्षेप को लेकर असंतोष उभर रहा है। वन मुख्यालय में यह पत्र केवल एक प्रशासनिक संवाद नहीं, बल्कि अधिकार क्षेत्र, प्रोटोकॉल और कार्यशैली को लेकर गहराते मतभेदों का संकेत बन गया है। आने वाले दिनों में यह विवाद उच्च स्तर तक पहुंचता है या आंतरिक स्तर पर सुलझता है, इस पर सभी की निगाहें टिकी हैं।