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गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध कान्हा टाइगर रिजर्व में करीब 150 वर्ष बाद जंगली भैंसा प्रजाति की वापसी ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में नई उम्मीद जगा दी है। पुनर्स्थापना अभियान के दूसरे चरण में सुपखार क्षेत्र में चार और जंगली भैंसों को विशेष सुरक्षित बाड़े में छोड़ा गया। इसके साथ ही कान्हा में इनकी संख्या बढ़कर आठ हो गई है। वन विभाग का मानना है कि इससे जंगलों की जैव विविधता मजबूत होगी और प्राकृतिक संतुलन को नई ताकत मिलेगी।

शनिवार को आयोजित कार्यक्रम में प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) समिता राजौरा, अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक एल. कृष्णमूर्ति सहित वन विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। अधिकारियों ने बताया कि मध्यप्रदेश में करीब डेढ़ सदी पहले विलुप्त हो चुकी इस प्रजाति को फिर से बसाने के लिए विशेष योजना पर काम किया जा रहा है। मुख्यमंत्री मोहन यादव की प्रेरणा से यह महत्वाकांक्षी परियोजना आगे बढ़ाई जा रही है।

विशेषज्ञों के मुताबिक जंगली भैंसों की वापसी जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बड़े शाकाहारी वन्यजीव घास क्षेत्रों, जल स्रोतों और वन्यजीव खाद्य श्रृंखला को संतुलित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसी कारण इस परियोजना को देश की महत्वपूर्ण वन्यजीव संरक्षण पहलों में शामिल माना जा रहा है।

काजीरंगा से कान्हा तक पहुंची ‘जंगली शान’

असम के प्रसिद्ध काजीरंगा टाइगर रिजर्व से इन जंगली भैंसों को विशेष वन्यजीव वाहनों के जरिए कान्हा लाया गया। वन विभाग ने सुपखार क्षेत्र का चयन इसलिए किया क्योंकि यहां पहले इस प्रजाति के अस्तित्व के प्रमाण मिल चुके हैं। परियोजना के पहले चरण में 28 अप्रैल को चार जंगली भैंसों को छोड़ा गया था। दूसरे चरण में चार और भैंसों के शामिल होने से अब कुल संख्या आठ हो गई है, जिनमें दो नर और छह मादा शामिल हैं।

72 घंटे तक चलता रहा निगरानी अभियान

करीब 2220 किलोमीटर लंबी सड़क यात्रा के दौरान विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों और वन्यजीव विशेषज्ञों की टीम लगातार निगरानी करती रही। लगभग 72 घंटे तक चले इस अभियान में जानवरों की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया गया। अधिकारियों के अनुसार पूरी प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव पुनर्वास मानकों के अनुरूप पूरी की गई ताकि जानवरों को किसी प्रकार का तनाव न हो।

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अगले तीन वर्षों में 50 भैंसे बसाने का लक्ष्य

वन विभाग ने आगामी तीन वर्षों में 50 जंगली भैंसों को पुनर्स्थापित करने का लक्ष्य तय किया है। अधिकारियों का कहना है कि यदि यह परियोजना सफल रहती है तो मध्यप्रदेश देश में विलुप्तप्राय वन्यजीव प्रजातियों के संरक्षण का बड़ा मॉडल बन सकता है। विशेषज्ञ इसे जैव विविधता संरक्षण और पर्यावरण संतुलन की दिशा में ऐतिहासिक पहल मान रहे हैं।