गयाजी
बिहार के गया जिले में दो मजदूरों द्वारा तराशी गई मशरूम के आकार की एक शिलाशि मूर्ति इस क्षेत्र से गुजरने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई है। यह संरचना जेठियां-राजगीर मार्ग पर अराई गांव के पास स्थित है, जो गया जिला मुख्यालय से लगभग 60-65 किलोमीटर दूर है। चट्टान के विशिष्ट आकार के कारण स्थानीय लोग इसे मशरूम पहाड़ कहते हैं।
मशरूम रॉक का जलवा
इस मूर्ति का निर्माण कछारा गांव के निवासी शौकी राजवंशी और विनोद मांझी ने किया था, जो पहले स्थानीय ठेकेदारों के अधीन पहाड़ी क्षेत्र में पत्थर तराशने का काम करते थे। स्थानीय निवासियों के अनुसार, दोनों व्यक्तियों ने हथौड़ा, छेनी और लोहे की छड़ों जैसे पारंपरिक औजारों का उपयोग करके एक विशाल चट्टान को आकार देने में कई वर्ष बिताए। यह कार्य आधुनिक मशीनों के उपयोग के बिना किया गया था। जिस चट्टान को मूल रूप से उन्हें पत्थर तोड़ने के काम के लिए सौंपा गया था, उसे उसके आकार और मजबूती के कारण काटना मुश्किल माना जाता था।
गांव को मिली पहचान
स्थानीय निवासियों का कहना है कि इस मूर्ति ने कछारा गांव को पहचान दिलाई है, जो पहले इस क्षेत्र के बाहर काफी हद तक अज्ञात था। इस मार्ग से गुजरने वाले यात्री अक्सर इस संरचना को देखने के लिए रुकते हैं, और स्थानीय लोगों का मानना है कि यह स्थल धीरे-धीरे एक छोटे पर्यटक आकर्षण के रूप में उभरा है।
पत्थर तराशने की विरासत
इस कहानी की तुलना दशरथ मांझी की विरासत से भी की गई है, जिन्हें लोकप्रिय रूप से "पहाड़ का आदमी" के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने दो दशकों से अधिक समय तक हाथ के औजारों का उपयोग करके गया जिले की एक पहाड़ी को काटकर रास्ता बनाया था। हालांकि मशरूम के आकार की यह मूर्ति अलग-अलग परिस्थितियों में बनाई गई थी, लेकिन स्थानीय निवासी इसे इस क्षेत्र की दृढ़ता और हस्तशिल्प का एक और उदाहरण मानते हैं।
