वन भवन भोपाल

कलकत्ता हाईकोर्ट ने 552 दिन की देरी से दायर पुनरीक्षण याचिका की खारिज, विभागीय लापरवाही उजागर

गणेश पाण्डेय, भोपाल। कलकत्ता हाईकोर्ट ने मध्यप्रदेश वन विभाग की बड़ी लापरवाही पर सख्त टिप्पणी करते हुए 552 दिनों की देरी से दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अब जब तक वन विभाग कल्पतरू एग्रो फॉरेस्ट प्रा.लि., कोलकाता को ₹1.20 करोड़ की डिक्री राशि का भुगतान नहीं करता, तब तक बालाघाट स्थित मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) और दक्षिण उत्पादन वनमंडल (डीएफओ) कार्यालयों की तालाबंदी नहीं हटेगी।

न्यायमूर्ति अनिरुद्ध रॉय ने अपने आदेश में कहा कि इतनी लंबी देरी के लिए कोई ठोस कारण प्रस्तुत नहीं किया गया और अंतरिम राहत की कोई गुंजाइश नहीं है। अदालत ने यह भी निर्देश दिए कि विरोध शपथपत्र 22 जनवरी 2026 तक तथा प्रत्युत्तर शपथपत्र 23 फरवरी 2026 तक दाखिल किया जाए।

11 जुलाई से सील हैं सीसीएफ–डीएफओ कार्यालय

यह प्रदेश के वन विभाग के इतिहास में पहला मामला है, जब बालाघाट का सीसीएफ कार्यालय और दक्षिण उत्पादन वनमंडल का डीएफओ कार्यालय 11 जुलाई से न्यायालय के आदेश पर सील हैं। फिलहाल दोनों अधिकारी रेंजर कॉलेज परिसर से कार्य संचालित करने को मजबूर हैं। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक अव्यवस्था को उजागर करती है, बल्कि न्यायिक आदेशों की अनदेखी का गंभीर उदाहरण भी है।

552 दिन की देरी: अफसरशाही की चूक भारी पड़ी

डिक्री के विरुद्ध पुनरीक्षण याचिका दायर करने की अनुमति देने में वन मंत्रालय और मुख्यालय स्तर पर बैठे शीर्ष अधिकारियों ने अत्यधिक देरी की। इसी अफसरशाही सुस्ती के चलते 552 दिन बीत गए और अदालत में विभाग को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। मामला बीते 20 वर्षों से लंबित था, लेकिन इस दौरान पदस्थ रहे किसी भी सीसीएफ या डीएफओ ने इसे गंभीरता से नहीं लिया।

एकतरफा डिक्री का कारण: न पैरवी, न उपस्थिति

विभाग द्वारा अधिकृत किए गए कलकत्ता के अधिवक्ता भी समय पर अदालत में उपस्थित नहीं हुए। परिणामस्वरूप जून 2024 में कल्पतरू एग्रो फॉरेस्ट प्रा.लि. के पक्ष में एकतरफा डिक्री पारित हो गई। इसके बाद भी विभाग ने न तो भुगतान किया और न ही समय रहते कानूनी कदम उठाए, जिससे जून 2025 में कार्यालय कुर्की और सीलिंग के आदेश जारी हो गए।

क्या है पूरा मामला

वर्ष 1997 में पश्चिम उत्पादन वनमंडल कार्यालय द्वारा 60 लॉट बांस की निविदा निकाली गई थी, जिसमें कल्पतरू एग्रो फॉरेस्ट प्रा.लि., कोलकाता को ठेका मिला। फर्म ने गर्रा और लांजी डिपो से 43 लॉट बांस उठाए, जबकि शेष डिपो में उपलब्ध बांस की गुणवत्ता खराब पाई गई। शिकायत के बावजूद विभाग ने कोई कार्रवाई नहीं की।

बाद में कार्यालय के मर्ज और बंद होने के कारण फर्म भुगतान करने के बावजूद शेष बांस नहीं उठा सकी। भुगतान की गई राशि भी विभाग ने वापस नहीं की। मजबूर होकर फर्म ने कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख किया। सुनवाई के बाद 20 जून 2025 को अदालत ने ₹1.20 करोड़ की राशि लौटाने का आदेश दिया, जिसमें लाभ और ब्याज भी शामिल था।

आदेश की अनदेखी से आई सीलिंग की नौबत

न्यायालय के आदेश के बावजूद भुगतान न होने पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कार्यालय सील करने का आदेश दिया। 11 जुलाई को पहुंची न्यायालयीन टीम ने अधिकारियों-कर्मचारियों को बाहर निकालकर दोनों कार्यालयों पर ताले जड़ दिए और नोटिस चस्पा कर दिया।

डीएफओ नेहा श्रीवास्तव की भूमिका पर सवाल

दक्षिण उत्पादन वनमंडल की तत्कालीन डीएफओ नेहा श्रीवास्तव पर तीन वर्षों तक अदालत में विभाग का पक्ष न रखने का आरोप है। बताया जा रहा है कि इसी लापरवाही के चलते मामला एकतरफा रूप से विभाग के खिलाफ चला गया। बावजूद इसके अब तक उनके विरुद्ध कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। वर्तमान में डीएफओ का प्रभार अरिहंत कोचर के पास है।

विभागीय छवि धूमिल

सीसीएफ–डीएफओ कार्यालयों की सीलिंग से वन विभाग की प्रशासनिक छवि को गहरा झटका लगा है। न्यायिक आदेशों की अवहेलना और शीर्ष स्तर की लापरवाही ने पूरे तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इनका कहना

सीसीएफ–डीएफओ कार्यालय खुलवाने के लिए अब विभाग को हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार ₹1.20 करोड़ का भुगतान करना होगा। यह हमारे अधिकारियों की लापरवाही का नतीजा है। जो भी इसके लिए जिम्मेदार पाया जाएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
— वी.एन. अंबाड़े, वन बल प्रमुख