वन मेले के मंच से मिले सियासी संकेत, मंत्रिमंडल विस्तार की अटकलें तेज
गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश में वन मंत्रालय को लेकर चल रही राजनीतिक चर्चाओं को उस समय नई धार मिल गई, जब अंतर्राष्ट्रीय वन मेले के समापन अवसर पर आदिम जाति कल्याण मंत्री कुँवर विजय शाह को मुख्य अतिथि बनाया गया।
वन मंत्री रामनिवास रावत के चुनाव हारने और त्यागपत्र देने के बाद से यह महत्वपूर्ण विभाग खाली पड़ा है, और अब तक सरकार नए वन मंत्री के नाम पर फैसला नहीं कर पाई है। ऐसे में वन मेले के मंच से उभरा यह घटनाक्रम संभावित मंत्रिमंडल विस्तार से जोड़कर देखा जा रहा है।
अब तक की परंपरा यह रही है कि लघु वनोपज संघ द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय वन मेले का समापन राज्यपाल द्वारा किया जाता रहा है, लेकिन इस बार परंपरा से हटकर विजय शाह को यह भूमिका दी गई। इसी बदलाव ने राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज कर दी है कि क्या सरकार एक बार फिर उन्हें वन मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपने की तैयारी में है।
परंपरा से हटकर फैसला
अब तक हर वर्ष अंतर्राष्ट्रीय वन मेले का समापन राज्यपाल करते रहे हैं। इस बार लघु वनोपज संघ की प्रबंध संचालक डॉ. समिता राजौरा ने विजय शाह को मुख्य अतिथि बनाया। इस निर्णय को सामान्य प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि सियासी संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
वन मंत्रालय में विजय शाह का अनुभव
विजय शाह भाजपा सरकार में दो बार वन मंत्री रह चुके हैं। दो कार्यकालों को मिलाकर लगभग पाँच वर्षों तक वन विभाग की जिम्मेदारी उनके पास रही। भाजपा शासनकाल में चौधरी चंद्रभान सिंह, ढाल सिंह बिसेन, राजेंद्र शुक्ला और सरताज सिंह जैसे नेता भी वन मंत्री बने, लेकिन सबसे लंबा कार्यकाल विजय शाह का ही रहा।
क्यों मजबूत मानी जा रही दावेदारी
निमाड़ अंचल के कद्दावर आदिवासी नेता के रूप में विजय शाह की पहचान है। आदिवासी समाज, वन क्षेत्रों और लघु वनोपज से जुड़े मामलों में उनका लंबा अनुभव उन्हें अन्य संभावित नामों से अलग करता है। इसी वजह से वन मंत्रालय के लिए उनका नाम बार-बार चर्चा में आ रहा है।
मौजूदा राजनीतिक पृष्ठभूमि
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सरकार गठन के बाद नागर सिंह चौहान को वन मंत्रालय सौंपा था, लेकिन कटनी जिन्ना खदान विवाद के बाद उनसे यह विभाग वापस ले लिया गया। तब से वन मंत्रालय बिना मंत्री के ही संचालित हो रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि वन मेले के मंच से मिला यह संकेत महज संयोग नहीं है। जब वन मंत्रालय खाली है और मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाएं तेज हैं, तब विजय शाह को मिला बढ़ा हुआ महत्व कई सवाल खड़े करता है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि क्या विजय शाह को आदिम जाति कल्याण विभाग के साथ-साथ वन मंत्रालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी जाती है, या सरकार किसी नए चेहरे पर भरोसा जताती है।
