चार महीने में पद से बाहर, साल भर में तीसरा तबादला — वन महकमे में सत्ता संघर्ष उजागर
गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश के वन विभाग में हालिया तबादला आदेशों ने प्रशासनिक प्रक्रिया से अधिक सत्ता संतुलन, अंदरूनी दबाव और चयनात्मक कार्रवाई की तस्वीर उजागर कर दी है। जंगल महकमे के इतिहास में यह पहला मौका माना जा रहा है जब 1991 बैच के वरिष्ठ पीसीसीएफ विभाष ठाकुर को महज चार महीने के भीतर संरक्षण जैसे अहम और प्रभावशाली पद से हटाकर अनुसंधान एवं विस्तार शाखा जैसे उनसे कनिष्ठ पद पर पदस्थ कर दिया गया। यह एक साल के भीतर उनका तीसरा तबादला है, जिसे विभागीय हलकों में “फुटबॉल बनाए जाने” के रूप में देखा जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, यह कार्रवाई किसी प्रशासनिक विफलता का परिणाम नहीं, बल्कि नर्मदापुरम के एक बीट में सामने आई ढाई करोड़ रुपये से अधिक की गोल्डन टीक कटाई के मामले में सख़्त रुख अपनाने का नतीजा है। बताया जाता है कि इस प्रकरण में एसीएस (वन) अशोक वर्णवाल के ‘ब्लू आई’ माने जाने वाले सीसीएफ अशोक कुमार और डीएफओ स्तर के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की पहल ने शीर्ष स्तर पर असहजता पैदा कर दी।
ढाई करोड़ की कटाई और रिश्तों की दीवार
विभागीय सूत्र बताते हैं कि गोल्डन टीक कटाई में दोषी पाए गए डीएफओ मयंक गुर्जर के खिलाफ आरोप-पत्र लंबे समय तक जारी नहीं हुआ। कार्रवाई तब आगे बढ़ी, जब मुख्य सचिव अनुराग जैन ने स्वयं इस प्रकरण को संज्ञान में लिया। बताया जा रहा है कि गुर्जर के पिता एक कैबिनेट मंत्री के यहां ओएसडी हैं और उनके तथा एसीएस (वन) अशोक वर्णवाल के बीच पुराने दोस्ताना संबंध हैं। यही कारण बताया जा रहा है कि मामला लंबे समय तक दबा रहा।
इतना ही नहीं, पीसीसीएफ विभाष ठाकुर को हटवाने में एक प्रभावशाली पीसीसीएफ अधिकारी की भूमिका भी चर्चा में है। विभागीय गलियारों में कहा जा रहा है कि कुछ माह पहले दोनों वरिष्ठ अधिकारियों के बीच चिट्ठीवार तक की स्थिति बन चुकी थी, जिसकी परिणति मौजूदा तबादले के रूप में सामने आई।
तबादला सूची देखने के लिए यहां क्लिक करे
तबादला सूची में कई चौंकाने वाले तथ्य
राज्य शासन ने बुधवार को 28 भारतीय वन सेवा (IFS) और 20 राज्य वन सेवा के अधिकारियों को प्रभारी डीएफओ सहित अन्य पदों पर पदस्थ करने के आदेश जारी किए। इस सूची को देखने पर कई हैरान करने वाले तथ्य सामने आते हैं।
एक ओर एपीसीसीएफ अमित दुबे को कैडर से इतर जाकर संरक्षण शाखा की जिम्मेदारी दी गई, वहीं दूसरी ओर सिवनी सर्किल का वन संरक्षक पद एक साल से खाली होने के बावजूद इस सूची में नहीं भरा गया। विभाग में चर्चा है कि सिवनी जैसे संवेदनशील सर्किल के लिए “मैनेजर टाइप” अधिकारी नहीं मिल पा रहा।
इसी कड़ी में क्षितिज कुमार की भोपाल सर्किल में वन संरक्षक के रूप में पदस्थापना भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि उनकी वर्किंग प्लान अभी पूरी नहीं हुई है। इसके विपरीत उज्जैन की वर्किंग प्लान पर कार्यरत वन संरक्षक किरण बिसेन की पोस्टिंग यह कहकर रोक दी गई कि तबादला बोर्ड के समक्ष गलत तथ्य प्रस्तुत किए गए। जबकि सच्चाई यह है कि 28 अगस्त 2025 को शासन ने उनका बंद लिफाफा खोलकर उन्हें वन संरक्षक पद पर प्रमोट कर दिया था।
तबादला बोर्ड नियमों की खुली अनदेखी
अखिल भारतीय सेवा अधिकारियों के लिए बने तबादला बोर्ड के नियम स्पष्ट हैं—यदि किसी अधिकारी को दो साल से पहले हटाया जाता है, तो इसके कारण दर्ज किए जाने चाहिए। लेकिन इस नियम का पालन न तो पीसीसीएफ विभाष ठाकुर के मामले में हुआ और न ही डिंडोरी डीएफओ पुनीत सोनकर के स्थानांतरण में, जिन्हें सवा साल के भीतर ही हटा दिया गया।
इसके उलट, धार टेंडर घोटाले में हटाए गए अशोक कुमार सोलंकी को मात्र दो महीने के भीतर ही डिंडोरी डीएफओ जैसी प्राइम पोस्टिंग दे दी गई। वहीं गंभीर आरोपों से घिरे एसडीओ संतोष कुमार रनशोरे को प्रभारी डीसीएफ बनाते हुए राज्य लघु वनोपज संघ में पदस्थ कर दिया गया।
वन विभाग की यह तबादला सूची प्रशासनिक सुधार से अधिक सत्ता संतुलन, व्यक्तिगत समीकरण और चयनात्मक कार्रवाई की कहानी कहती है। सख़्ती दिखाने वाले अधिकारी हाशिए पर जाते दिख रहे हैं, जबकि विवादों से घिरे अफसरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिल रही हैं। इससे न केवल विभाग की कार्यप्रणाली, बल्कि तबादला प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
