नर्मदापुरम में करोड़ों की गोल्डन टीक कटाई पर विभाग की लीपापोती, एनजीटी ने स्वतः संज्ञान लेकर बनाई संयुक्त समिति, 20 अप्रैल को सुनवाई
गणेश पाण्डेय, भोपाल। नर्मदापुरम वन मंडल में 1242 गोल्डन टीक (सागौन) पेड़ों की अवैध कटाई का मामला अब प्रदेश के सबसे बड़े वन अपराध प्रकरणों में शामिल हो गया है। बावजूद इसके, डीएफओ से लेकर रेंजर तक किसी पर भी अब तक कोई कठोर कार्रवाई नहीं हो सकी है। विभाग ने केवल आरोप-पत्र जारी कर औपचारिकता निभाई, जबकि करोड़ों के नुकसान वाले इस मामले को गंभीरता से दबाने की कोशिशें साफ नजर आईं। इसी लापरवाही को देखते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामले को अपने अधिकार क्षेत्र में लिया है।
एनजीटी की पीठ, जिसमें न्यायिक सदस्य जस्टिस अरुण कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल शामिल हैं, ने निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर माना कि इस प्रकरण में कुल 1242 सागौन के पेड़ और 38 ठूंठ पाए गए। अवैध कटाई से राज्य को लगभग 2.04 करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ है। यह तथ्य 14 सितंबर 2025 की निरीक्षण रिपोर्ट में सामने आ चुके थे, इसके बावजूद न तो उच्च अधिकारियों को समय पर सूचित किया गया और न ही प्रभावी वन अपराध प्रकरण दर्ज किया गया। एनजीटी ने इसे कर्तव्य में घोर लापरवाही मानते हुए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय नगर निगम ग्रेटर मुंबई बनाम अंकिता सिन्हा (2022) का हवाला देकर स्वतः संज्ञान अधिकार का प्रयोग किया।
संयुक्त समिति गठित
एनजीटी ने इस प्रकरण में मध्यप्रदेश शासन, मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, वरिष्ठ वन अधिकारी और नर्मदापुरम नगर पालिका को प्रतिवादी बनाया है। सभी पक्षों को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं।
मामले की जांच के लिए संयुक्त समिति बनाई गई है, जिसमें मुख्य वन संरक्षक, प्रमुख सचिव पर्यावरण विभाग, एमपीईएफ एंड सीसी का क्षेत्रीय कार्यालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रतिनिधि शामिल हैं। समिति को स्थल निरीक्षण कर चार सप्ताह में तथ्यात्मक रिपोर्ट और कार्रवाई विवरण प्रस्तुत करना होगा। एमपीपीसीबी को नोडल एजेंसी बनाया गया है। अगली सुनवाई 20 अप्रैल को होगी।
डीएफओ पर अब तक आरोप-पत्र भी नहीं
ढाई करोड़ रुपये मूल्य की गोल्डन टीक कटाई के मामले में मंत्रालय से लेकर मुख्यालय तक शीर्ष अधिकारी डीएफओ मयंक गुर्जर, एसडीओ मानसिंह मरावी और रेंजर महेंद्र गौर को बचाने में लगे हुए हैं। चार महीने बीत जाने के बाद भी डीएफओ गुर्जर को आरोप-पत्र जारी नहीं किया गया। बताया जाता है कि वन बल प्रमुख वी.एन. अंबाड़े के दबाव में तैयार किया गया आरोप-पत्र अपर मुख्य सचिव वन अशोक वर्णवाल के कार्यालय में ही रोक दिया गया।
हालांकि मुख्य सचिव अनुराग जैन ने कार्रवाई के स्पष्ट निर्देश दिए थे, फिर भी फाइलें आगे नहीं बढ़ीं। एसडीओ मरावी और रेंजर महेंद्र गौर को केवल आरोप-पत्र देकर कार्रवाई के नाम पर औपचारिकता पूरी कर ली गई।
दोहरा मापदंड उजागर
सिवनी के केवलारी क्षेत्र में 34 लाख रुपये की सागौन कटाई के मामले में रेंजर सहित चार कर्मचारियों को तत्काल निलंबित कर दिया गया था, जबकि छीपाबाबा बीट के करोड़ों के प्रकरण में रेंजर महेंद्र गौर को आज तक निलंबित नहीं किया जा सका। इससे विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
संक्षेप में मामला
इटारसी जोन की छीपाबाबा बीट में 1242 सागौन पेड़ों की अवैध कटाई सामने आने के बाद स्पष्ट हुआ कि निरीक्षण रिपोर्ट होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर समय रहते कोई कार्रवाई नहीं की गई। पर्यावरण प्रेमी मधुकर चतुर्वेदी ने इस मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की थी, जिसके बाद यह प्रकरण राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आया। अंततः एनजीटी को स्वतः संज्ञान लेकर जांच समिति गठित करनी पड़ी।
नर्मदापुरम का यह प्रकरण केवल वन अपराध नहीं, बल्कि प्रशासनिक संरक्षण, दोहरे मापदंड और जवाबदेही की विफलता का प्रतीक बन चुका है। अब 20 अप्रैल की सुनवाई यह तय करेगी कि करोड़ों के जंगल कटे, तो जिम्मेदारों पर भी कानून चलेगा या नहीं।
