वन बल प्रमुख के आदेश से बढ़ी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, वन और वन्यजीव सुरक्षा प्रबंधन पर पड़ रहा असर
गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश वन विभाग में मुख्यालय स्तर की लगातार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) से मैदानी अधिकारी और कर्मचारी गंभीर दबाव में हैं। वन बल प्रमुख वी.एन. अंबाड़े के एक लिखित आदेश के बाद फील्ड अफसरों की दिनचर्या बुरी तरह प्रभावित हुई है। मैदानी अमले का कहना है कि हालात ‘ऑफिस अरेस्ट’ जैसे बन गए हैं, जिससे वन और वन्यजीवों की सुरक्षा से जुड़ा मैनेजमेंट प्रभावित हो रहा है।
पिछले सप्ताह लगातार चार दिन अलग-अलग शाखाओं के पीसीसीएफ द्वारा लंबी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग हुई। सोमवार को लघु वनोपज संघ की एमडी डॉ. समिता राजौरा की दोपहर 12:30 बजे से वीसी हुई, जबकि अपरान्ह 2:30 बजे से पीसीसीएफ कैंपा और वर्किंग प्लान को लेकर मनोज अग्रवाल की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग आयोजित की गई। फील्ड अफसरों का कहना है कि कुछ वीसी में शाखा से इतर विषयों पर भी सवाल-जवाब होने लगते हैं, जिससे तनाव और बढ़ जाता है।
एक आदेश, बढ़ता बोझ
वन बल प्रमुख ने 1 नवंबर को आदेश जारी कर कहा था कि प्रत्येक सोमवार अथवा मंगलवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग होगी। हालांकि, व्यवहार में यह तय दिनों तक सीमित नहीं रही। पिछले सप्ताह सोमवार से बुधवार तक लगातार वीसी होने से डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) और उनका स्टाफ फील्ड कार्य से कट गया। अफसरों के अनुसार, एक वीसी की तैयारी और उसके निराकरण में 2–3 दिन लग जाते हैं, ऐसे में हर सप्ताह वीसी से मैदानी निगरानी कमजोर पड़ रही है।
फील्ड जिम्मेदारियां बनाम वीसी दबाव
एक डीएफओ के क्षेत्राधिकार में औसतन एक लाख हेक्टेयर (औसत प्रशासनिक दायित्व) तक जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा का जिम्मा होता है। इसमें वन संरक्षण, वन्यजीव सुरक्षा, अवैध कटाई-शिकार रोकना, वनोपज प्रबंधन, राजस्व संग्रह और पर्यावरण संरक्षण जैसे अहम कार्य शामिल हैं। लगातार वीसी के कारण वन भ्रमण, निरीक्षण और त्वरित कार्रवाई बाधित होने की बात अफसर खुलकर कह रहे हैं।
डीएफओ का सुझाव
प्रदेश के करीब 90 प्रतिशत डीएफओ का मत है कि
वन बल प्रमुख की उपस्थिति में 15 दिन में एक बार समन्वित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग हो,
सभी शाखाओं के प्रमुख (पीसीसीएफ/एपीसीसीएफ) अपने-अपने एजेंडे स्पष्ट रखें,
इससे डीएफओ और सीएफ को रोजमर्रा के फील्ड कार्य के लिए पर्याप्त समय मिलेगा।
अफसरों का कहना है कि वन बल प्रमुख की उपस्थिति से वीसी की गरिमा भी बढ़ेगी और एजेंडा-स्पष्टता रहेगी।
डीएफओ के प्रमुख दायित्व
- वन संरक्षण: वनों को कटाई, अतिक्रमण और वनाग्नि से सुरक्षित रखना।
- वन्यजीव संरक्षण: वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा उनके प्राकृतिक आवासों का संरक्षण एवं प्रबंधन करना।
- अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण: लकड़ी की तस्करी, अवैध शिकार एवं अन्य वन अपराधों की रोकथाम करना।
- वनरोपण कार्य: नर्सरी संचालन एवं वृक्षारोपण से संबंधित गतिविधियों का क्रियान्वयन।
- मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन: वन्य प्राणियों से होने वाली जनहानि, जनघायल, पशु हानि एवं फसल क्षति के मामलों में त्वरित संज्ञान लेकर जांच कराना तथा पीड़ितों को शीघ्र मुआवजा भुगतान की व्यवस्था करना।
- संयुक्त वन प्रबंधन: वन क्षेत्रों से 5 किमी के दायरे में स्थित राजस्व/वन ग्रामों में संयुक्त वन प्रबंधन समितियों का गठन कराना।
- वन अधिकार अधिनियम: अधिनियम के अंतर्गत गठित जिला स्तरीय समितियों में सदस्य के रूप में सहभागिता तथा आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराना।
- विकास योजनाओं का क्रियान्वयन: वन मंडल में संचालित विभिन्न विकास योजनाओं का कार्यान्वयन एवं प्रगति का अनुश्रवण।
- निरीक्षण कार्य: अधीनस्थ परिक्षेत्र कार्यालयों का वर्ष में कम से कम एक बार निरीक्षण करना।
- मैदानी भ्रमण: वन क्षेत्रों का व्यापक भ्रमण एवं चल रहे कार्यों की निगरानी।
- वन अपराध प्रबंधन: वन अपराध प्रकरणों में अन्वेषण, प्रशमन, मुआवजा महसूल वसूली, जप्त वनोपज/वाहन/उपकरणों के निर्वर्तन तथा अभियोजन की प्रगति की निगरानी।
- सीमा संरक्षण: वन सीमाओं का रख-रखाव तथा मुनारों का निर्माण एवं मरम्मत।
- इंजीनियरिंग कार्य: सड़क, पुल, बांध एवं सिंचाई से संबंधित कार्यों की योजना बनाना और उनका क्रियान्वयन।
- सीमा विवाद समाधान: राजस्व एवं वन विभाग के मध्य सीमा विवादों के निराकरण हेतु जिला कलेक्टर के साथ समन्वय।
- अंतर-विभागीय समन्वय: कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक एवं अन्य जिला स्तरीय अधिकारियों से सतत संपर्क एवं समन्वय।
- राजस्व संग्रह: वन-आधारित गतिविधियों के माध्यम से शासकीय राजस्व संग्रह का प्रबंधन।
- कार्यालय प्रबंधन: कार्यालयों का सुचारु संचालन तथा कर्मचारियों के प्रशिक्षण एवं विकास की जिम्मेदारी।
