हॉफ चयन में हो गया बड़ा खेला

वरिष्ठता बनाम मेरिट की खींचतान में नहीं बनी सहमति; तीन वरिष्ठ आईएफएस अधिकारियों का पैनल भेजा गया

गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश में वन बल प्रमुख (हॉफ) के चयन को लेकर इस बार अभूतपूर्व स्थिति बन गई है। संभवतः राज्य के प्रशासनिक इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक में हॉफ के नाम पर सहमति नहीं बन सकी। वरिष्ठता और मेरिट के बीच चले लंबे विमर्श के बाद भी जब एकमत निर्णय नहीं हो पाया तो तीन वरिष्ठ आईएफएस अधिकारियों का पैनल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पास अंतिम निर्णय के लिए भेज दिया गया। अब इस महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति का फैसला सीधे मुख्यमंत्री स्तर पर होगा।

राज्य मंत्रालय में मुख्य सचिव अनुराग जैन की अध्यक्षता में शनिवार अपराह्न आयोजित बैठक में प्रमुख सचिव संदीप यादव, वर्तमान हॉफ वीएन अंबाड़े तथा भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में हरियाणा के हॉफ विनीत कुमार गर्ग वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से शामिल हुए। बैठक में चयन प्रक्रिया को लेकर विस्तृत चर्चा हुई, लेकिन वरिष्ठता क्रम बनाम कार्यकाल की उपयोगिता के मुद्दे पर मतभेद उभर आए।

सूत्रों के अनुसार, बैठक के दौरान एक विशेष लॉबी के सक्रिय होने की चर्चा भी रही। वन महकमे में पहली बार यह संदेश गया कि बाहरी दबावों के बीच निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हुई है। हालांकि आधिकारिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की गई है, परंतु विभागीय हलकों में इसको लेकर व्यापक चर्चा है।

तीन नामों का पैनल: वरिष्ठता, अनुभव और कार्यकाल पर बहस

डीपीसी ने जिन अधिकारियों के नाम पैनल में शामिल किए हैं, उनमें

  • 1989 बैच के आईएफएस एवं वन विकास निगम के प्रबंध संचालक एचयू खान,
  • 1990 बैच के आईएफएस एवं पीसीसीएफ (अनुसंधान एवं विस्तार) विभाष कुमार ठाकुर,
  • 1991 बैच के मुख्य वन्य प्राणी अभिरक्षक शुभ रंजन सेन शामिल हैं।

तर्क दिया जा रहा है कि यदि वरिष्ठता के आधार पर एचयू खान का चयन होता है तो उनका कार्यकाल लगभग पांच माह का रहेगा। इसके बाद क्रम में विभाष कुमार ठाकुर का कार्यकाल लगभग सात माह का हो सकता है। वहीं यदि शुभ रंजन सेन को जिम्मेदारी सौंपी जाती है तो उनका कार्यकाल अप्रैल 2028 तक रहेगा, जो अपेक्षाकृत लंबा और स्थिर माना जा रहा है।

यहीं से वरिष्ठता बनाम दीर्घकालिक स्थिरता की बहस तेज हो गई है।

पूर्व उदाहरणों ने उठाए सवाल, कार्यकाल तर्क पर विवाद

विभागीय सूत्रों का कहना है कि कार्यकाल की अवधि को आधार बनाना नया तर्क नहीं है, परंतु पूर्व उदाहरण इस धारणा को कमजोर करते हैं।
पूर्व में एके पाटिल का कार्यकाल मात्र एक माह का रहा था, जबकि वर्तमान हॉफ वीएन अंबाड़े का कार्यकाल भी लगभग सात माह का ही है और वे 28 फरवरी को सेवानिवृत्त हो रहे हैं।

इसके अलावा बीएमएस राठौर, यू प्रकाशम और जव्वाद हसन जैसे अधिकारियों का कार्यकाल भी सीमित अवधि का रहा है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि यदि पूर्व में अल्पकालीन कार्यकाल के बावजूद नियुक्तियां होती रही हैं, तो इस बार कार्यकाल को प्रमुख आधार क्यों बनाया जा रहा है।

परंपरा टूटने के संकेत, नजरें मुख्यमंत्री के निर्णय पर

अब तक हॉफ चयन में वरिष्ठता को प्रमुख आधार माना जाता रहा है। लेकिन इस बार की प्रक्रिया ने संकेत दिया है कि परंपरागत व्यवस्था चुनौती के दौर से गुजर रही है।

वन महकमे में चर्चा है कि यह निर्णय केवल एक पदस्थापना नहीं, बल्कि विभाग की आगामी प्रशासनिक दिशा और प्राथमिकताओं को भी तय करेगा। अब अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के हाथ में है। उनके फैसले से स्पष्ट होगा कि सरकार वरिष्ठता की परंपरा को आगे बढ़ाती है या दीर्घकालिक नेतृत्व को प्राथमिकता देती है। वन विभाग और प्रशासनिक हलकों में इस नियुक्ति को लेकर उत्सुकता चरम पर है, क्योंकि आने वाला निर्णय न केवल एक व्यक्ति का चयन होगा, बल्कि वन प्रशासन की कार्यशैली और संतुलन की दिशा भी निर्धारित करेगा।