ट्रेंकुलाइज से पहले मौत या ओवरडोज का असर? विशेषज्ञों ने उठाए कई गंभीर सवाल
गणेश पाण्डेय, भोपाल। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में एक हमलावर बाघ की मौत का रहस्य तीसरे दिन भी बरकरार है। बाघ के शव का पोस्टमार्टम राज्य वन्यजीव स्वास्थ्य संस्थान (SWFH) जबलपुर में कराया गया है और अब सभी की नजर पोस्टमार्टम रिपोर्ट तथा लैब जांच पर टिकी है। इस बीच पूरे घटनाक्रम को लेकर वन्यजीव विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि वन्य प्राणी प्रबंधन यह मान रहा था कि ट्रेंकुलाइज करने से पहले ही बाघ की मौत हो चुकी थी, तो फिर उसे ट्रेंकुलाइज करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? विशेषज्ञों का कहना है कि किसी वन्य प्राणी के जीवित या मृत होने की पुष्टि के लिए अन्य विकल्प भी मौजूद होते हैं। ऐसे में ट्रेंकुलाइज का निर्णय कई संदेह खड़े कर रहा है।
45 डिग्री तापमान में ट्रेंकुलाइज पर सवाल
घटना के समय बांधवगढ़ में तापमान 44-45 डिग्री सेल्सियस बताया जा रहा है। इतनी भीषण गर्मी में टाइगर को ट्रेंकुलाइज करने के निर्णय पर मुख्य वन्य प्राणी अभिरक्षक और पार्क प्रबंधन की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है।
सेवानिवृत्त पीसीसीएफ (वन्य प्राणी) जेएस चौहान ने कहा कि बाघ की गर्दन पर ट्रेंकुलाइज करना नासमझी है। सामान्यतः टाइगर के पिछले हिस्से को निशाना बनाया जाता है और यदि ऐसा संभव न हो तो कंधे (सोल्डर) पर डार्ट किया जाता है। मीडिया में सामने आई तस्वीरों में गर्दन पर डार्ट लगने के संकेत दिखाई दे रहे हैं।
“एंटी-डोज नहीं दिया गया होगा”
बांधवगढ़ के पूर्व फील्ड डायरेक्टर मृदुल पाठक ने भी पूरे मामले पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि आमतौर पर वन्य प्राणियों को शाम के समय या ठंडे मौसम में ट्रेंकुलाइज किया जाता है, दोपहर की तेज गर्मी में नहीं।
उन्होंने आशंका जताई कि संभवतः ट्रेंकुलाइज के बाद समय पर एंटी-डोज नहीं दिया गया। उनके अनुसार ट्रेंकुलाइज करने के बाद 15-20 मिनट के भीतर एंटी-डोज देना जरूरी होता है। यदि इसमें चूक हुई हो तो जानवर की जान पर खतरा बढ़ जाता है। पाठक ने यह भी कहा कि “लगता है निशाने में भी चूक हुई है, जिससे लापरवाही की आशंका और मजबूत होती है।”
दूसरी बार पोस्टमार्टम, पहली बार ऐसा मामला
मध्यप्रदेश के वन्यजीव इतिहास में पहली बार किसी टाइगर का दोबारा पोस्टमार्टम कराया गया है। 24 मई 2026 को बांधवगढ़ में एनटीसीए प्रोटोकॉल के तहत पहला पोस्टमार्टम हुआ, जबकि 25 मई को जबलपुर स्थित राज्य वन्यजीव स्वास्थ्य संस्थान में तीन पशु चिकित्सकों की टीम ने पुनः परीक्षण किया।
इस दौरान SWFH के संचालक, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक, एनडीवीएसयू जबलपुर के पैथोलॉजी विशेषज्ञ और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। जांच टीम को रेस्क्यू ऑपरेशन से जुड़े फोटो और वीडियो भी उपलब्ध कराए गए। अधिकारियों का कहना है कि मौत का वास्तविक कारण लैब जांच और अंतिम पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगा।
बांधवगढ़ का पुराना विवादित ट्रैक रिकॉर्ड
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व पहले भी वन्यजीव मौतों और कथित लापरवाही को लेकर विवादों में रहा है। पूर्व में टाइगर मौत के मामलों में तत्कालीन पीसीसीएफ वन्य प्राणी रवि श्रीवास्तव और पीके मिश्रा को पद से हटाया जा चुका है। वहीं कोदो-कुटकी खाने से हाथियों की मौत के मामले में पीसीसीएफ वन्य प्राणी वीएन अंबाड़े को हटाया गया था और तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर गौरव चौधरी को निलंबित किया गया था।
इसी कारण मौजूदा मामला भी बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। वन्यजीव प्रबंधन से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस मामले में निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय नहीं हुई तो यह वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करेगा।
