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चित्तौड़गढ़

 राजस्थान के विख्यात कृष्ण धाम श्री सांवलिया सेठ मंदिर में श्रद्धालुओं की अगाध आस्था अब सोने और चांदी की दिव्य भव्यता के रूप में साकार हो उठी है। मंदिर मंडल द्वारा भक्तों से चढ़ावे के रूप में मिले 20 किलोग्राम सोने और 120 किलोग्राम चांदी का उपयोग करके ठाकुर जी के गर्भगृह के लिए एक अत्यंत मनमोहक और अलौकिक पिछवाई तैयार करवाई गई है।

भगवान श्रीकृष्ण की मूल प्रतिमा के ठीक पीछे स्थापित की गई यह नई पिछवाई अपनी बेजोड़ कलात्मकता और वैभव के कारण इन दिनों मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी हुई है।

सागवान की लकड़ी पर नक्काशी
इस भव्य कलाकृति को तैयार करने में उस समय लगभग 16 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत आई थी। इसकी मजबूती को बनाए रखने के लिए इसे सागवान की उच्च गुणवत्ता वाली लकड़ी के विशेष पैनल पर मढ़ा गया है।

सोने और चांदी की अत्यंत महीन व बारीक नक्काशी से सुसज्जित यह कलाकृति मंदिर के गर्भगृह के सौंदर्य को एक अद्वितीय और दिव्य स्वरूप प्रदान करती है। आपको बता दें कि इस प्रसिद्ध मंदिर को राजस्थान सरकार की महत्वाकांक्षी धार्मिक सर्किट योजना में भी शामिल किया गया है।

राजकोट के कारीगरों की मेहनत
इस दिव्य पिछवाई के निर्माण के विषय में जानकारी देते हुए ट्रस्ट के अध्यक्ष हजारीलाल वैष्णव ने बताया कि इस अलौकिक कृति को आकार देने के लिए विशेष रूप से गुजरात के राजकोट से कुशल शिल्पकारों को आमंत्रित किया गया था।

इस पूरी कलाकृति को धरातल पर उतारने में कारीगरों को पूरे 90 दिनों का समय लगा। इस ऐतिहासिक काम की कुल निर्माण लागत 16 करोड़ रुपये रही है।

सीसीटीवी की निगरानी में पिघलाया गया सोना-चांदी
सबसे पहले चढ़ावे में आए सोने और चांदी को उच्च तापमान पर गलाकर उनकी सिल्लियां तैयार की गईं, जिन्हें बाद में आधुनिक मशीनों की मदद से महीन और पतली शीट्स में परिवर्तित किया गया। इन तैयार स्वर्ण और रजत शीट्स पर अनुभवी कारीगरों द्वारा बेहद बारीक नक्काशी की गई और फिर इन्हें सागवान की लकड़ी से बने सुदृढ़ पैनलों पर मजबूती से फिट कर दिया गया।

मूल्यवान धातुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निर्माण के दौरान पूरे मंदिर परिसर में 24 घंटे सशस्त्र सुरक्षाकर्मी तैनात रहे। धातु को गलाने से लेकर नक्काशी करने तक की संपूर्ण निर्माण प्रक्रिया को चौबीसों घंटे सीसीटीवी कैमरों की सख्त निगरानी में अंजाम दिया गया।

इस पूरे प्रोजेक्ट के लिए किसी भी बाहरी कोष या फंड से कोई मदद नहीं ली गई, बल्कि यह पूर्ण रूप से भक्तों द्वारा ठाकुर जी के चरणों में समर्पित किए गए सोने और चांदी से ही संपन्न हुआ।

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