उत्तम कुमार शर्माकूनो में चार साल के कार्यकाल के अनुभव साझा करने वाले उत्तम कुमार शर्मा।

गणेश पाण्डेय, भोपाल। कूनो नेशनल पार्क में प्रोजेक्ट चीता के शुरुआती दौर को लेकर फील्ड डायरेक्टर रहे उत्तम कुमार शर्मा ने अपने चार साल के अनुभव साझा किए हैं। 25 अगस्त को एक्स पर किए पोस्ट में शर्मा ने बताया कि 31 अगस्त 2026 को वे चीता प्रोजेक्ट के फील्ड डायरेक्टर के रूप में चार साल पूरे करेंगे। उन्होंने अपने अनुभव को असाधारण यात्रा बताते हुए कहा कि इस दौरान उन्हें चीतों के साथ काम करने वाले शुरुआती भारतीय आईएफएस अधिकारियों में शामिल होने का अवसर मिला। उनके साझा किए अनुभव में प्रोजेक्ट के शुरुआती छह महीने सबसे चुनौतीपूर्ण दौर के रूप में सामने आते हैं।

एक्स पर उत्तम कुमार शर्मा ने चार साल के कार्यकाल के अनुभव साझा किए।
एक्स पर उत्तम कुमार शर्मा ने चार साल के कार्यकाल के अनुभव साझा किए।

शुरुआत में लगा, चीतों का अनुकूलन आसान रहेगा

भारत में चीता पुनर्स्थापना की शुरुआत 17 सितंबर 2022 को हुई थी, जब नामीबिया से आठ चीते कूनो लाए गए। इसके बाद 18 फरवरी 2023 को दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते भारत पहुंचे। इस तरह कूनो में शुरुआती तौर पर 20 चीतों के साथ प्रोजेक्ट आगे बढ़ा। एनटीसीए के अनुसार, इस परियोजना का उद्देश्य भारत में चीते की पारिस्थितिक भूमिका को फिर स्थापित करना और उसके ऐतिहासिक क्षेत्र में इस प्रजाति को दोबारा बसाना है।

शर्मा के अनुभव के मुताबिक शुरुआती समय में परिस्थितियां अपेक्षाकृत सामान्य रहीं। टीम को उम्मीद थी कि नई परिस्थितियों में चीते अपेक्षा के मुताबिक आसानी से अनुकूलित हो जाएंगे। लेकिन इसके बाद घटनाक्रम तेजी से बदला और प्रोजेक्ट के सामने स्वास्थ्य, प्रबंधन तथा चीतों के अनुकूलन से जुड़ी गंभीर चुनौतियां सामने आईं।

कूनो में प्रोजेक्ट चीता के तहत लाए गए चीते।
कूनो में प्रोजेक्ट चीता के तहत लाए गए चीते।

मार्च से अगस्त 2023 तक मौतों का सिलसिला

कूनो में पहली बड़ी चिंता मार्च 2023 में सामने आई, जब नामीबिया से आई मादा चीता साशा की मौत हुई। इसके बाद अप्रैल में नर चीता उदय और मई में दक्षिण अफ्रीका से आई मादा चीता दक्ष की मौत हुई। 23 मई को ज्वाला के चार शावकों में से एक की मौत हुई। दो दिन बाद उसके दो और शावकों की मौत हो गई। इस तरह मई के अंत तक तीन भारत में जन्मे शावक भी नहीं बच सके।

इसके बाद जुलाई और अगस्त 2023 में भी वयस्क चीतों की मौत हुई। 2 अगस्त को मादा चीता धात्री की मौत के बाद कूनो में मौतों की संख्या नौ पहुंच गई। उस समय तक छह वयस्क और तीन भारत में जन्मे शावकों की मौत हो चुकी थी।

एक ही दिन तीन शावकों की मौत ने बढ़ाई चिंता

शर्मा के अनुभव में भारत में जन्मे पहले चीता शावकों की मौत बेहद महत्वपूर्ण घटना रही। ज्वाला ने मार्च 2023 में चार शावकों को जन्म दिया था। 23 मई को एक शावक की मौत हुई और 25 मई को दो और शावकों ने दम तोड़ दिया। वन विभाग ने उस समय शावकों की कमजोरी, गर्मी और निर्जलीकरण जैसी परिस्थितियों को मौत से जोड़ते हुए उपचार की जानकारी दी थी।

इन घटनाओं ने यह सवाल जरूर खड़ा किया कि भारतीय परिस्थितियों में चीता और उसके शावकों के दीर्घकालीन अस्तित्व के लिए प्रबंधन की रणनीति कितनी प्रभावी होगी। हालांकि, परियोजना के अधिकारियों और विशेषज्ञों ने मौतों का वैज्ञानिक परीक्षण कर कारणों को समझने की प्रक्रिया जारी रखी।

कूनो में मादा चीता और उसके शावक
कूनो में मादा चीता और उसके शावक।

मौतों के बाद जांच और नेक्रोप्सी

एनटीसीए की परियोजना रिपोर्ट के अनुसार, कूनो में प्रत्येक मृत चीते का नेक्रोप्सी परीक्षण किया गया। जरूरत के अनुसार नमूने स्वतंत्र विशेषज्ञ संस्थानों को भी भेजे गए, ताकि मौत के कारणों की पुष्टि की जा सके। एनटीसीए ने यह भी दर्ज किया है कि पुनर्स्थापना परियोजनाओं में कुछ मृत्यु स्वाभाविक रूप से भी हो सकती हैं और प्रत्येक मामले की अलग-अलग जांच जरूरी है।

इस लिहाज से 2023 का दौर केवल मौतों का आंकड़ा नहीं था, बल्कि भारत में दशकों बाद चीते को फिर बसाने की प्रक्रिया के सामने आई वास्तविक चुनौतियों का दौर था। लगातार मौतों के बीच परियोजना के प्रबंधन, स्वास्थ्य निगरानी और भविष्य की रणनीति पर देश-विदेश में बहस हुई।

कूनो के खुले क्षेत्र में विचरण करता चीता
कूनो के खुले क्षेत्र में विचरण करता चीता।

“चीते कूनो में टिक पाएंगे?” सबसे बड़ा सवाल

नौ मौतों के बाद सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या कूनो में चीते लंबे समय तक टिककर अपनी आबादी स्थापित कर पाएंगे। उस समय विशेषज्ञों और सार्वजनिक बहस में परियोजना की रणनीति को लेकर अलग-अलग मत सामने आए। हालांकि, केंद्र और एनटीसीए ने परियोजना को जारी रखा और चीतों की निगरानी, स्वास्थ्य प्रबंधन तथा अन्य जरूरी व्यवस्थाओं पर काम आगे बढ़ाया।

शर्मा की पोस्ट का अगला हिस्सा इस अनुभव को व्यक्तिगत सीख से जोड़ता है। वे लिखते हैं कि चीता उनके लिए एक शिक्षक की तरह रहा और हर दिन ने उन्हें कुछ नया सीखने का अवसर दिया। उनके मुताबिक, चीतों के व्यवहार और बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना किसी प्रशिक्षण या मैनुअल से पूरी तरह नहीं सीखा जा सकता।

चार साल बाद पीछे मुड़कर देखा तो बदली तस्वीर

शर्मा ने अपनी पोस्ट में लिखा है कि चार साल के सफर में टीम ने आलोचनाओं और चिंताओं का सामना किया। उन्होंने बताया कि शुरुआत में कुछ लोगों की आशंकाएं थीं कि चीते कूनो में जीवित नहीं रह पाएंगे या वहां के परिदृश्य में टिक नहीं सकेंगे। उनके अनुसार, समय के साथ परियोजना उस स्थिति तक पहुंची जहां चीतों ने दो स्थानों पर खुद को स्थापित किया और तीसरे स्थान की तैयारी भी आगे बढ़ी।

एनटीसीए की वर्तमान परियोजना जानकारी के अनुसार, चीता पुनर्स्थापना कार्यक्रम का लक्ष्य केवल चीतों को भारत लाना नहीं, बल्कि उन्हें उपयुक्त आवास में स्थापित कर दीर्घकालीन संरक्षण और पारिस्थितिक लाभ हासिल करना है।

शर्मा के चार साल के अनुभव का सार यही है कि 2023 का संकट प्रोजेक्ट चीता के लिए बेहद कठिन परीक्षा था, लेकिन उसी दौर ने भारत में चीता प्रबंधन की आगे की रणनीति के लिए कई महत्वपूर्ण सबक भी दिए। शर्मा ने अपनी पोस्ट के अंत में संकेत दिया है कि वे आने वाले दिनों में अपने अनुभव के और पहलुओं को साझा करेंगे।