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मानसून में भी जंगल की निगरानी नहीं रुकी, सैटेलाइट ने पकड़ी पेड़ कटाई, आग और अतिक्रमण

मप्र के चार वन मंडलों में Google Earth Engine आधारित सिस्टम सक्रिय; अगस्त में 46 अलर्ट मौके पर सत्यापित

सैटेलाइट और रडार से वन क्षेत्रों की निगरानी, मौके पर पहुंचकर वन अमला कर रहा सत्यापन

गणेश पाण्डेय, भोपाल। मानसून में घने बादल और लगातार बारिश के बीच जब जंगलों में पारंपरिक निगरानी मुश्किल हो जाती है, तब मध्यप्रदेश में उपग्रह आधारित रियल-टाइम वन निगरानी प्रणाली वन अमले के लिए अतिरिक्त डिजिटल आंख की तरह काम कर रही है। अगस्त 2026 में इस प्रणाली से मिले 46 अलर्ट का वन अमले ने मौके पर जाकर सत्यापन किया। गुना डीएफओ अक्षय राठौर की परिकल्पना और तकनीकी विकास से तैयार यह प्रणाली फिलहाल बुरहानपुर, गुना, विदिशा और खंडवा वन मंडलों में सक्रिय बताई गई है। इसका उद्देश्य वन क्षेत्र में पेड़ों की कटाई, आगजनी और वनभूमि पर अतिक्रमण जैसे बदलावों की शुरुआती पहचान करना है। मध्यप्रदेश में उपग्रह, एआई और फील्ड फीडबैक को जोड़कर रियल-टाइम वन अलर्ट सिस्टम लागू किया जा चुका है।

बारिश में भी नहीं रुकती निगरानी

इस प्रणाली की खासियत मानसून के दौरान सामने आती है। सामान्य ऑप्टिकल सैटेलाइट तस्वीरें घने बादलों से प्रभावित हो सकती हैं, जबकि Sentinel-1 SAR जैसे रडार डेटा से जमीन की सतह में हुए बदलावों के संकेत हासिल किए जा सकते हैं। इससे बादलों के कारण ऑप्टिकल तस्वीरें उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में भी निगरानी जारी रखने में मदद मिलती है। उपलब्ध विवरण के अनुसार सिस्टम सैटेलाइट डेटा और Google Earth Engine आधारित विश्लेषण से संभावित भूमि उपयोग परिवर्तन को चिन्हित करता है और अलर्ट फील्ड स्टाफ तक पहुंचाता है।

गुना में 2,144 वर्ग किमी क्षेत्र की चुनौती

गुना वन मंडल का बड़ा भौगोलिक क्षेत्र वन अमले के लिए लगातार निगरानी की चुनौती रखता है। ऐसे में हर हिस्से में लगातार कर्मचारी भेजने के बजाय सिस्टम पहले उन स्थानों की पहचान करने में मदद करता है जहां असामान्य बदलाव दिखाई देता है। इसके बाद संबंधित कर्मचारी मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति की जांच करते हैं। सिस्टम में फील्ड स्टाफ की GPS टैग वाली तस्वीरें, टिप्पणियां और अन्य फीडबैक भी दर्ज किए जाने की व्यवस्था है।

अलर्ट का मतलब सीधे कार्रवाई नहीं

सैटेलाइट अलर्ट के बाद वन अमले द्वारा सत्यापित मामलों का विवरण।
सैटेलाइट अलर्ट के बाद वन अमले द्वारा सत्यापित मामलों का विवरण।

सिस्टम से आने वाला हर अलर्ट अवैध कटाई या अतिक्रमण की पुष्टि नहीं होता। यह संभावित बदलाव का संकेत है। अंतिम पुष्टि मौके पर पहुंचने वाला वन अमला करता है। यही वजह है कि किसी अलर्ट के बाद वास्तविक स्थिति सामान्य मिलने को सिस्टम की विफलता नहीं माना जा सकता। उपग्रह असामान्य बदलाव की पहचान करता है, जबकि कार्रवाई का आधार मैदानी सत्यापन बनता है।

चार महीनों में आग, पेड़ गिरने और अतिक्रमण के संकेत

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार निगरानी के दौरान दो आगजनी की घटनाओं की पहचान हुई। चार प्राकृतिक रूप से गिरे पेड़ों की घटनाएं भी दर्ज की गईं। इसके अलावा वनभूमि पर बुवाई शुरू होने के करीब 10 दिन के भीतर संभावित अतिक्रमण का अलर्ट मिलने की बात सामने आई है। पुराने अतिक्रमण की दोबारा पुष्टि के मामले भी सिस्टम की निगरानी में आए।

बुवाई शुरू होते ही पकड़ में आया बदलाव

सैटेलाइट अलर्ट में सामने आया ताजा वन भूमि अतिक्रमण।
सैटेलाइट अलर्ट में सामने आया ताजा वन भूमि अतिक्रमण।

वनभूमि अतिक्रमण की शुरुआती पहचान इस तकनीक की उपयोगिता का अहम उदाहरण है। यदि वनभूमि पर खेती शुरू होने के करीब 10 दिन में बदलाव का संकेत मिल जाता है, तो वन अमले के पास शुरुआती चरण में ही मौके पर पहुंचने का अवसर रहता है। इससे अतिक्रमण के स्थायी रूप लेने से पहले कार्रवाई की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि किसी भी अलर्ट को अंतिम निष्कर्ष मानने के बजाय उसका भौतिक सत्यापन जरूरी है।

पारंपरिक गश्त का विकल्प नहीं, डिजिटल मदद

यह प्रणाली वन कर्मचारियों की गश्त और मैदानी निगरानी का विकल्प नहीं है। इसका उद्देश्य यह पता लगाने में मदद करना है कि बड़े वन क्षेत्र में किस स्थान पर बदलाव हुआ है और कहां तत्काल जांच की जरूरत है। रियल-टाइम अलर्ट सिस्टम में सैटेलाइट डेटा, मशीन लर्निंग और फील्ड फीडबैक को एक साथ इस्तेमाल किया जाता है।

अब असली परीक्षा अलर्ट से कार्रवाई तक

मानसून के दौरान रडार आधारित निगरानी से मिले अलर्ट का विवरण।
मानसून के दौरान रडार आधारित निगरानी से मिले अलर्ट का विवरण।

तकनीक जंगल में बदलाव का संकेत दे सकती है, लेकिन उसकी उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि अलर्ट मिलने के बाद वन अमला कितनी तेजी से मौके पर पहुंचता है और कितने अलर्ट वास्तविक वन अपराध या अतिक्रमण में बदलते हैं। इसलिए डिजिटल निगरानी की सफलता केवल अलर्ट की संख्या से नहीं, बल्कि अलर्ट से ग्राउंड वेरिफिकेशन और फिर प्रभावी कार्रवाई तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया से तय होगी। मध्यप्रदेश में शुरू हुई यह व्यवस्था बड़े वन क्षेत्रों की निगरानी को तकनीक के साथ जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयोग के रूप में सामने आई है।