Ibn वन शहीद दिवस पर विशेष

सबसे बड़ा सवाल—क्या वनकर्मी को ड्यूटी पर भेजने से पहले सरकार उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करती है?

गणेश पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार
गणेश पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार

गणेश पाण्डेय, भोपाल। जंगल की सीमा पर खड़ा वनरक्षक सिर्फ सरकारी कर्मचारी नहीं होता। वह जंगल और जंगल को लूटने वालों के बीच खड़ी आखिरी दीवार होता है। उसके सामने कभी अवैध कटाई करने वाले होते हैं, कभी शिकारी, कभी वनभूमि पर कब्जा करने वाले और कई बार हथियारबंद अपराधी। फर्क सिर्फ इतना है कि सामने वाले के पास हमला करने की तैयारी होती है और वनकर्मी के हाथ में अक्सर विभागीय जिम्मेदारियों की लंबी सूची।

वन शहीद दिवस पर मध्यप्रदेश के जंगलों से यही सबसे कड़वा सवाल उठ रहा है—जिन वनकर्मियों ने जंगल बचाते हुए अपनी जान दे दी, क्या उनके बलिदान के बाद व्यवस्था सुधरी या नहीं?

हर साल वन शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है। स्मरण सभाएं होती हैं। अधिकारियों के भाषण होते हैं। शहीदों के साहस और कर्तव्यनिष्ठा की चर्चा होती है। लेकिन असली परीक्षा भाषणों की नहीं, उस व्यवस्था की है जिसमें आज भी एक वनरक्षक को हजारों हेक्टेयर जंगल, सीमित स्टाफ और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच काम करना पड़ता है।

जंगलों में अवैध कटाई, शिकार, वन्यजीव तस्करी और अतिक्रमण लगातार वन अमले के लिए चुनौती हैं। कई संवेदनशील इलाकों में वनकर्मियों का सामना ऐसे लोगों से होता है जो संगठित तरीके से जंगल को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं कि वनकर्मी ने कितनी बहादुरी दिखाई। सवाल यह भी है कि उसे पर्याप्त सुरक्षा देकर मैदान में उतारा गया था या नहीं?

क्या संवेदनशील इलाकों में जोखिम का वैज्ञानिक आकलन होता है? क्या गश्ती दल के पास भरोसेमंद संचार व्यवस्था है? क्या रात की गश्त के लिए पर्याप्त सुरक्षा संसाधन हैं? क्या आपात स्थिति में पुलिस और वन विभाग के बीच तत्काल सहायता की व्यवस्था है? और सबसे बड़ा सवाल—अगर कोई वनकर्मी ड्यूटी के दौरान शहीद हो जाए तो उसके परिवार की जिम्मेदारी सरकार कितनी मजबूती से उठाती है?

श्रद्धांजलि से आगे बढ़ना होगा। वन शहीद दिवस को सिर्फ पुष्पांजलि का कार्यक्रम बना देना उन शहीदों के बलिदान को छोटा करना होगा। शहीद वनकर्मियों के नाम पर होने वाले कार्यक्रम तभी सार्थक होंगे जब उनके बलिदान से वन सुरक्षा की व्यवस्था मजबूत हो।

वन विभाग का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा अधिकारी नहीं, वनरक्षक

वन विभाग का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा मुख्यालय में बैठा अधिकारी नहीं, बल्कि जंगल की बीट में तैनात वह वनरक्षक है जो बारिश, गर्मी, अंधेरी रात और दुर्गम रास्तों में गश्त करता है। लेकिन यदि वही वनरक्षक वाहन, संचार साधन, पर्याप्त स्टाफ और सुरक्षा संसाधनों के अभाव में काम कर रहा है तो सवाल कर्मचारी की बहादुरी पर नहीं, व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर उठना चाहिए।

जंगल की सुरक्षा फाइलों से नहीं होती

कागजों पर वन सुरक्षा की योजनाएं बन सकती हैं। बजट स्वीकृत हो सकता है। बैठकें हो सकती हैं। निर्देश जारी हो सकते हैं। लेकिन जंगल की असली सुरक्षा तब होती है जब मैदानी कर्मचारी के पास मौके पर कार्रवाई करने की क्षमता हो।

आज जरूरत है कि संवेदनशील वन क्षेत्रों की श्रेणीवार सुरक्षा ऑडिट हो। प्रत्येक रेंज में उपलब्ध स्टाफ, वाहन, संचार व्यवस्था और जोखिम की समीक्षा सार्वजनिक रूप से की जाए। जहां खतरा अधिक है, वहां अतिरिक्त बल और संसाधन तत्काल उपलब्ध कराए जाएं।

साथ ही वनकर्मियों के लिए नियमित प्रशिक्षण, आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली और स्थानीय पुलिस के साथ बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया जाए।

शहीद परिवारों की चिंता कौन करेगा?

वनकर्मी की शहादत के बाद परिवार के सामने केवल भावनात्मक संकट नहीं होता। रोजमर्रा की जिंदगी, बच्चों की पढ़ाई, रोजगार और भविष्य की सुरक्षा भी सवाल बन जाती है। इसलिए सरकार को वन शहीद परिवारों के लिए सहायता और पुनर्वास की व्यवस्था को सिर्फ घोषणा तक सीमित नहीं रखना चाहिए।

सहायता की प्रक्रिया सरल, समयबद्ध और पारदर्शी होनी चाहिए, क्योंकि जिस कर्मचारी ने सरकार की संपत्ति—जंगल—की रक्षा करते हुए अपनी जान दी, उसके परिवार को सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें, इससे बड़ी विडंबना क्या होगी?

अब श्रद्धांजलि नहीं, जवाब चाहिए

वन शहीद दिवस पर प्रदेश को यह तय करना होगा कि शहीद वनकर्मी केवल विभागीय स्मृति-पट्टिका का हिस्सा रहेंगे या उनके बलिदान से वन सुरक्षा की नई व्यवस्था भी बनेगी।

सरकार को बताना चाहिए—कितने वनकर्मी ड्यूटी के दौरान शहीद हुए, उनके परिवारों को क्या सहायता मिली, संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था कितनी मजबूत हुई और पिछले वर्षों में वन सुरक्षा पर खर्च किए गए संसाधनों का मैदानी असर कितना दिखाई देता है?

क्योंकि जंगल बचाने वाला वनरक्षक अगर खुद सुरक्षित नहीं है, तो जंगल की सुरक्षा का दावा कितना मजबूत है? वन शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि फूल-माला नहीं, एक ऐसी व्यवस्था होगी जिसमें अगला वनकर्मी शहीद होने के लिए नहीं, सुरक्षित लौटकर अपने घर जाने के लिए ड्यूटी पर निकले।

और यही वह कसौटी है जिस पर सरकार, वन विभाग और पूरी व्यवस्था को अब परखा जाना चाहिए।