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पन्ना के केरबन में सांभर की मौत का मामला, अब विभागीय जांच में उठे नए सवाल

गणेश पाण्डेय, भोपाल। उत्तर पन्ना वनमंडल के केरबन रेंज में 1 सितंबर को सामने आई फीमेल सांभर की संदिग्ध मौत का मामला अब विभागीय जांच के घेरे में है। पहले इसे कथित शिकार से जोड़कर देखा गया था, लेकिन वन विभाग अब तक यह स्पष्ट नहीं कर सका है कि सांभर की मौत किसी शिकारी के हाथों हुई या टाइगर के किल में हुई। मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि घटना की जानकारी किसी नियमित वन्यजीव निगरानी कार्रवाई के दौरान नहीं, बल्कि दो बीट गार्डों के बीच हुए विवाद के बाद सामने आई।

कंपार्टमेंट पी-387 में सांभर के अवशेष मिलने की बात सामने आने के बाद विभागीय स्तर पर जांच शुरू की गई है। डीएफओ उत्तर पन्ना धीरेन्द्र प्रताप सिंह ने एसडीओ कृष्णा और रेंजर अजय बाजपेयी को मामले की जांच सौंपी है। इससे पहले एपीसीसीएफ वन्यप्राणी एल. कृष्णमूर्ति ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए बाघ के किल और संभावित शिकार दोनों पहलुओं से जांच के निर्देश दिए थे। अब सवाल यह है कि जब शव या उसके अवशेष ही उपलब्ध नहीं हैं, तो जांच किन ठोस साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ेगी।

बीट गार्डों की लड़ाई में सामने आया मामला

वन विभाग की आंतरिक व्यवस्था पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि घटना के तत्काल बाद कोई औपचारिक रिपोर्ट सामने नहीं आई। जानकारी के अनुसार, दो बीट गार्डों के बीच आपसी विवाद के दौरान सांभर की मौत से जुड़ी बातें सामने आईं। इसके बाद मामला वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचा।

यदि घटना वास्तव में 1 सितंबर को हुई थी, तो यह जांच का विषय है कि संबंधित बीट गार्ड, चौकीदार, रेंजर और अन्य मैदानी कर्मचारियों ने इसे तत्काल रिपोर्ट क्यों नहीं किया। वन्यजीव अपराध या संदिग्ध वन्यप्राणी मृत्यु के मामलों में सूचना में देरी से न केवल जांच प्रभावित होती है, बल्कि संभावित साक्ष्य भी नष्ट हो सकते हैं।

शव नाले में बहा, अब जांच के सामने सबसे बड़ी चुनौती

स्थानीय स्तर पर यह जानकारी सामने आई है कि वन्यजीव का शव या उसके बचे हुए अवशेष नाले में बहा दिए गए। रेंजर अजय बाजपेयी का तर्क है कि क्षेत्र टाइगर रिजर्व से लगा हुआ है और संभव है कि सांभर को टाइगर ने किल किया हो। उनके अनुसार, बाद में सियार जैसे अन्य वन्यजीवों ने शव के अवशेष खा लिए होंगे और भारी बारिश के कारण बचे हुए अवशेष नाले में बह गए होंगे।

यह तर्क जांच का एक संभावित पहलू हो सकता है, लेकिन इससे कई सवाल भी खड़े होते हैं। यदि सांभर टाइगर का शिकार था, तो घटनास्थल पर किल के प्रमाण सुरक्षित क्यों नहीं किए गए? क्या वहां पंजों के निशान, बाल, खून, दांतों के निशान या अन्य जैविक साक्ष्य मौजूद थे? क्या घटनास्थल की तत्काल फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कराई गई? क्या आसपास के क्षेत्र में टाइगर की मौजूदगी के कोई कैमरा ट्रैप या गश्ती रिकॉर्ड उपलब्ध हैं?

रेंजर का अलग तर्क, शिकार की संभावना अभी खत्म नहीं

रेंजर अजय बाजपेयी ने संबंधित क्षेत्र में इस तरह की घटनाओं को सामान्य बताते हुए टाइगर द्वारा सांभर के शिकार की संभावना जताई है। उनका कहना है कि भारी बारिश के कारण अवशेष बह गए होंगे। हालांकि, उपलब्ध तस्वीरों में सांभर के शरीर का पिछला हिस्सा अलग दिखाई देता है, जिसे लेकर पहले शिकार की आशंका जताई गई थी।

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यही विरोधाभास जांच को महत्वपूर्ण बनाता है। एक ओर विभागीय अधिकारी इसे प्राकृतिक शिकारी के हमले का संभावित परिणाम मान रहे हैं, दूसरी ओर एपीसीसीएफ वन्यप्राणी ने तस्वीर के आधार पर शिकार की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया है। इसलिए किसी एक संभावना को अंतिम सत्य मानकर जांच आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा।

डीएफओ ने खुद डॉग स्क्वाड के साथ किया निरीक्षण

डीएफओ धीरेन्द्र प्रताप सिंह ने बताया कि उन्होंने एसडीओ को जांच सौंप दी है और स्वयं भी डॉग स्क्वाड के साथ घटनास्थल का निरीक्षण किया है। उनका कहना है कि हर संभावना के आधार पर जांच कराई जाएगी और रिपोर्ट मिलने के बाद ही आगे की कार्रवाई होगी।

डीएफओ का यह बयान जांच की गंभीरता को दर्शाता है, लेकिन अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि घटनास्थल के निरीक्षण में क्या मिला। यदि शव उपलब्ध नहीं है, तो जांच अधिकारियों को फोटो, GPS लोकेशन, घटनास्थल के निशान, गवाहों के बयान, बीट गार्डों की ड्यूटी डायरी, गश्ती रिकॉर्ड और मोबाइल लोकेशन जैसे साक्ष्यों पर निर्भर रहना पड़ सकता है।

वन सुरक्षा व्यवस्था पर भी होगी जवाबदेही तय

केरबन बीट टाइगर रिजर्व से लगी संवेदनशील वन सीमा में स्थित है। ऐसे क्षेत्र में वन्यप्राणियों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखना और संदिग्ध घटनाओं की तत्काल सूचना देना मैदानी अमले की जिम्मेदारी है। यदि एक वन्यप्राणी की मौत के बाद कई दिनों तक रेंजर और डीएफओ स्तर पर कोई सूचना नहीं पहुंची, तो यह केवल एक कर्मचारी की चूक का मामला नहीं माना जा सकता।

जांच में यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि क्या बीट में नियमित रात्रि गश्त हो रही थी, क्या गश्ती दल के GPS रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, क्या चौकीदार और बीट गार्ड के बयान दर्ज किए गए हैं और क्या घटना के बाद किसी अधिकारी ने समय पर घटनास्थल का निरीक्षण किया था। यदि सूचना तंत्र में लापरवाही सामने आती है, तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

पन्ना के जंगलों में सांभर शिकार का खतरा पहले भी सामने आया

पन्ना क्षेत्र में सांभर जैसे संरक्षित वन्यप्राणियों के शिकार के मामले पहले भी सामने आते रहे हैं। दिसंबर 2025 में सलेहा वन परिक्षेत्र में बिजली के तार का इस्तेमाल कर सांभर के शिकार का मामला सामने आया था। वन विभाग ने कार्रवाई करते हुए एक आरोपी को गिरफ्तार किया था और सांभर का मांस बरामद किए जाने की जानकारी दी थी।

हाल ही में कान्हा टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में भी सांभर के शिकार के आरोप में तीन लोगों की गिरफ्तारी की खबर सामने आई है। उनके कब्जे से सांभर का मांस और अन्य अवयव जब्त किए गए थे।

इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि वन्यजीवों के शिकार का खतरा केवल कोर टाइगर रिजर्व तक सीमित नहीं है। सामान्य वन क्षेत्रों, बफर जोन और वन्यजीवों के आवागमन वाले इलाकों में भी निगरानी व्यवस्था मजबूत रखना जरूरी है। केरबन की घटना इसी व्यापक सुरक्षा तंत्र की परीक्षा बन गई है।

अब जांच में इन सवालों के जवाब जरूरी

  • क्या 1 सितंबर को घटनास्थल का तत्काल निरीक्षण किया गया था?
  • क्या सांभर के शव या अवशेष सुरक्षित किए गए थे?
  • यदि शव नाले में बह गया, तो इसकी पुष्टि किस आधार पर हुई?
  • क्या घटनास्थल की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कराई गई?
  • क्या मौके से पदचिह्न, बाल, खून, हथियार या अन्य भौतिक साक्ष्य मिले?
  • क्या टाइगर के किल की पुष्टि करने वाले कोई प्रमाण उपलब्ध हैं?
  • क्या बीट गार्डों के GPS और गश्ती रिकॉर्ड जांचे गए हैं?
  • चौकीदार और बीट गार्ड को घटना की जानकारी कब मिली?
  • रेंजर और एसडीओ को सूचना देने में देरी क्यों हुई?
  • क्या बीट गार्डों के बीच विवाद के कारण मामला सामने आया?
  • क्या शव या अवशेषों को सुरक्षित नहीं रखने की जिम्मेदारी तय होगी?
  • यदि शिकार की पुष्टि होती है तो इतने दिनों तक वन सुरक्षा तंत्र को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई?

केरबन की घटना में असली परीक्षा केवल यह पता लगाने की नहीं है कि सांभर को किसने मारा। उससे पहले यह पता लगाना जरूरी है कि वन विभाग का सूचना तंत्र इतना कमजोर क्यों रहा कि एक संवेदनशील वन क्षेत्र में हुई संदिग्ध मौत की जानकारी समय पर वरिष्ठ अधिकारियों तक नहीं पहुंच सकी। शव के बिना जांच कठिन जरूर है, लेकिन उपलब्ध तस्वीरों, GPS लोकेशन, गवाहों और विभागीय रिकॉर्ड के आधार पर जिम्मेदारी तय की जा सकती है।