सागर
भारत सरकार द्वारा देश के 15 लिविंग कल्चरल स्पेस की सूची में सागर के एरण को शामिल किए जाने के बाद एक वैश्विक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की तैयारी हो रही है. एरण एक ऐसा स्थान है, जहां हड़प्पा के समकालीन ताम्र पाषाण कालीन संस्कृति से लेकर गुप्तकालीन वास्तुकला के एक से बढ़कर एक उदाहरण है. एरण को भारत सरकार की DESH (डेवलपमेंट ऑफ एक्सकैवेशन साइट्स एंड हेरिटेज कॉम्प्लेक्स) योजना के तहत देश के उन 15 पुरास्थलों में शामिल किया गया है. जिन्हें लिविंग कल्चरल स्पेस के तौर पर विकसित किया जाएगा।
ऐसे में एरण के पुरावशेष जो अंग्रेजों के समय कोलकाता और लंदन म्यूजियम ले जाए गए हैं. उनको फिर से एरण में वापस ले जाने की चर्चा तेज हो गयी है. इसी कड़ी में सबसे पहली मांग कोलकाता के नेशनल म्यूजियम ले जाए गए समुद्रगुप्त के अभिलेख को वापस लाने की मांग ने जोर पकड़ा है. खास बात ये है कि इस मुहिम में पुरातत्वविद और जनप्रतिनिधि भी शामिल हैं और एरण के वैभवशाली इतिहास को अपने मूल स्थान पर वापस देखना चाहते हैं।
समुद्रगुप्त के अभिलेख कोलकाता म्यूजियम से आएंगे वापस!
एरण को लिविंग कल्चरल स्पेस में शामिल किए जाने के साथ ही यहां के पुरातत्वविद और हेरिटेज लवर इस बात की मांग उठाने लगे हैं कि जब एरण को एक पर्यटन और पुरातत्व महत्व के स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है. तो एरण की वो मूर्तियां और पुरावशेष जो देश विदेश ले जाए गए हैं, उनको वापस लाया जाए. इस सिलसिले में सबसे पहला नाम समुद्रगुप्त के अभिलेख का सामने आया है. दरअसल समुद्रगुप्त का अभिलेख एरण के विष्णु मंदिर के पास मिला था।
जिसका उल्लेख ब्रिटिश अफसर जो इंजीनियर होने के साथ साथ भारतीय पुरातत्व के विद्वान के रूप में मशहूर हुए, उन्होंने अपनी किताब टूर रिपोर्ट बुंदेलखंड एंड मालवा में किया है. ये अभिलेख जनरल एलेक्जेंडर कनिंघम 1874-75 को मिला था और वो इस अभिलेख को एरण से कोलकाता से कोलकाता ले गए थे. जहां वो नेशनल म्यूजियम में रखा गया है. ये अभिलेख गुप्तकालीन ब्राह्मी और संस्कृत भाषा में लिखा गया है. इस अभिलेख की चौड़ाई 9 इंच, 3 फीट 1 इंच ऊंचा है. इसमें उकेरे गए अक्षरों का आकार आधे इंच का है।
क्या लिखा है समुद्रगुप्त अभिलेख में
एरण के मूल निवासी और इंदिरा गांधी जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति व पुरातत्व प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष प्रो. मोहनलाल चढ़ार बताते हैं कि, ''इस अभिलेख में काफी महत्वपूर्ण जानकारियां हैं. इसमें समुद्रगुप्त को वीरता और नीति और तुष्टि में कुबेर के समान और क्रोधित होने पर यम के समान बताया गया है. समुद्रगुप्त को भक्ति नीति, पराक्रम से राजा की उपाधि के माध्यम से अपनी कीर्ति बढ़ाने वाला बताया गया है. समुद्रगुप्त को स्वर्णदान करने में राजा प्रथु एवं राघव से बताया गया है. लेख में समुद्रगुप्त को संपूर्ण पृथ्वी के संपूर्ण राज्यों को जीतकर वैभव प्रदान करने वाला बताया गया है. लेख के अनुसार समुद्रगुप्त के न्याय और पराक्रम से प्रसन्न होकर उसके पिता चंद्गगुप्त प्रथम ने उसे राजा शब्द से अभिषेक कर सम्मानित किया था और उत्रराधिकारी नियुक्त किया।
अभिलेख में समुद्रगुप्त की पत्नी दत्तदेवी का उल्लेख
प्रो, मोहनलाल चढ़ार बताते हैं कि, ''इस अभिलेख में समुद्रगुप्त के साथ उनकी पत्नी दत्तदेवी का भी उल्लेख है. उसे उच्च कुल वाली कुलवधु राजलक्ष्मी एवं पतिव्रता नारी के रूप में बताया गया है. समुद्रगुप्त दत्तदेवी के अनेक पुत्र और पौत्रों की जानकारी अभिलेख में मिलती है. अभिलेख में कहा गया है कि दत्तदेवी गुप्त वंश में राजलक्ष्मी के रूप में आयी और उसके आने के पश्चात इस राजवंश में आमोद प्रमोद का वातावरण हो गया. अभिलेख के अनुसार दत्तदेवी के विवाह के समय वह अपने साथ हाथी घोड़े रत्न धन्य धान्य से युक्त होकर आयी थी. लेख में समुद्गगुप्त को अनेक युद्धों में विजय करने वाला, ओजस्वी यश प्राप्त करने वाला, युद्ध क्षेत्र में उर्जावान एवं कुशल बताया गया है।
एरिकेण नाम से एरण का उल्लेख
जनरल एलेक्जेंडर कनिंघम के अनुसार, ''इस अभिलेख को विष्णु मंदिर की स्थापना से संबंधित बताया गया है. समुद्रगुप्त ने ऐरिकेण प्रदेश को अपना स्वभोग नगर बनाया था, इसकी जानकारी अभिलेख में मिलती है. अभिलेख में समुद्गगुप्त के नाम का उल्लेख है. एरण का नाम एरिकेण लिखा गया है. एरण क्षेत्र को नगर एवं प्रदेश शब्दों के साथ उल्लेख किया गया है. अभिलेख में उल्लेख मिलता है कि समुद्ग गुप्त के पराक्रम से उसके शत्रु सपने में भी आतंकित रहते थे।
समुद्रगुप्त वृद्धावस्था के दिनों में पत्नी, उससे उत्पन्न पुत्रों व बहुओं और पौत्रों के साथ आमोद पूर्वक रहने के लिए एरण आया था. अभिलेख एरण में किए गए किसी निर्माण कार्य का उल्लेख करता है, लेकिन अभिलेख के अंश से ये स्पष्ट नहीं होता है कि निर्माण कार्य क्या था अथवा किस देवता से संबंधित था. अभिलेख के सुरक्षित अंश में कोई तिथि नहीं दी गई है. यदि तिथि दी गई होगी, तो वह नष्ट हो चुकी है. अभिलेख की पांचवीं पंक्ति ’स्वभोगनगऐरिकिण प्रदेशे’ का अर्थ प्रो. कृष्णदत्त वाजपेयी ने 'अपने आमोद-प्रमोद के नगर ऐरिकिण क्षेत्र के नगर ऐरिकिण प्रदेशे' माना है।
सागर सांसद बढ़ाएगी मुहिम को आगे
सांसद लता वानखेड़े का कहना है कि, ''सागर संसदीय क्षेत्र में एरण महत्वपूर्ण पुरास्थल है. सबसे पहले मैं मुख्यमंत्री का धन्यवाद करना चाहूंगी कि मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने उसे मध्य प्रदेश के कैलेंडर में शामिल कर महोत्सव की शुरुआत कराई है. इसके अलावा मैं लगातार केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को पत्र लेकर एरण के विकास के लिए अनुरोध किया है और उसी का नतीजा है कि आज एरण लिविंग कल्चरल स्पेस के रूप में जाना जाएगा. मुझे जानकारी मिली है कि, एरण की कई पुरातत्व महत्व की मूर्तियां अलग-अलग जगह पर ले जायी गयी हैं. एरण से लंदन मूर्तियां ले जाई गई हैं और समुद्रगुप्त का प्रसिद्ध अभिलेख कोलकाता म्यूजियम ले जाया गया है. मैं इन सब को वापस लाने के लिए केंद्र सरकार के माध्यम से प्रयास करूंगी।
