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गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश इस वर्ष गर्मी की शुरुआत से ही गंभीर जल संकट की ओर बढ़ रहा है। राज्य के प्रमुख जलस्रोत तेजी से सूख रहे हैं और भूजल स्तर भी चिंताजनक गति से नीचे जा रहा है। नदियों की धारा टूटने लगी है, जिससे अंदेशा है कि आने वाले महीनों में स्थिति और भयावह हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार प्रदेश की 30 से अधिक नदियों पर सूखने का खतरा मंडरा रहा है, वहीं कई जिलों में जल संकट की आहट सुनाई देने लगी है।

बीते दिनों ग्वालियर में जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट की अध्यक्षता में हुई बैठक में इस विकराल होते संकट पर गहरी चिंता जताई गई। बैठक के दौरान भाजपा विधायकों ने अधिकारियों पर जल जीवन मिशन में लापरवाही और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए। देवास, खंडवा, रायसेन समेत प्रदेश के आधे से अधिक जिले इस समय पेयजल संकट से जूझ रहे हैं।

जल जीवन मिशन में घोटाले के आरोप, सरकार के गोलमोल जवाब

विधानसभा के पिछले सत्र में 36 से अधिक विधायकों ने जल जीवन मिशन में गड़बड़ी, घटिया सामग्री के इस्तेमाल और ठेकेदारों की लापरवाही को लेकर सवाल उठाए। लेकिन सरकार की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। रीवा, शहडोल, ग्वालियर सहित कई जिलों में इस योजना में अनियमितताओं के मामले सामने आ चुके हैं।

बैतूल विधायक हेमंत खंडेलवाल ने जल जीवन मिशन के तहत कुछ गांवों के छूट जाने का मुद्दा उठाया, तो रीवा विधायक दिव्यराज सिंह, गंजबासौदा विधायक हरिसिंह समेत कई जनप्रतिनिधियों ने योजनाओं में भ्रष्टाचार को लेकर आवाज उठाई।

जिन विधायकों ने विधानसभा में सवाल उठाए:
हेमंत खंडेलवाल, दिव्यराज सिंह, हरिसिंह, अभिजीत शाह, दिनेश जैन, भूपेंद्र सिंह, हरदीप सिंह डंग, धीरेंद्र लोधी, सुरेंद्र सिंह, विजयपाल सिंह, प्रदीप लारिया, हीरालाल अलावा, कालुसिंह ठाकुर, राजेंद्र पांडे, बाबूलाल जडेल, सोनलाल वाल्मी, विश्वामित्र पाठक, शरद कोल, श्रीकांत बत्रवेदी, अमरीश बाबु और विक्रांत भूरिया।

प्रधानमंत्री की योजना पर अफसरशाही का ग्रहण

जल जीवन मिशन के तहत प्रदेश के हर गांव में नल से जल पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया था। लेकिन भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी और अधिकारियों की लापरवाही ने इस योजना को बुरी तरह प्रभावित किया है। आज भी प्रदेश की केवल 64 फीसदी आबादी ही इस योजना का लाभ उठा पा रही है, जबकि मार्च 2023 तक शत-प्रतिशत लक्ष्य हासिल करने का दावा किया गया था।

ग्रामीण इलाकों में पेयजल व्यवस्था बेहद खराब है। नल-जल योजना सिर्फ कागजों पर ही सजीव दिखाई देती है, जबकि जमीनी स्तर पर इसका असर न के बराबर है।

नदियों पर मंडराता सूखने का खतरा

प्रदेश की 30 से अधिक नदियों पर सूखने का खतरा मंडरा रहा है। नर्मदा, बेतवा, सोन, ताप्ती, चंबल, सिंध, माही, पार्वती, धसान, केन, कुनो और क्षिप्रा सहित कई नदियां अत्यधिक जल दोहन और अवैध रेत उत्खनन की वजह से संकटग्रस्त हैं। शहरी इलाकों की नदियां अतिक्रमण की भेंट चढ़ गई हैं। पारिस्थितिकी तंत्र का असंतुलन भी नदियों के प्रवाह को लगातार कम कर रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अभी स्थिति ऐसी है, तो मई-जून में हालात और गंभीर हो सकते हैं। सात प्रमुख नदियों की 150 से अधिक सहायक नदियों की धारा फरवरी-मार्च में ही टूट चुकी थी। रेत माफिया का आतंक इतना है कि कई नदियों का प्राकृतिक प्रवाह समाप्त हो गया है।

नदियों की स्थिति एक नजर में:

  • चंबल: महू से इटावा तक 843 किमी, मुरैना के पास धारा कमजोर।
  • पार्वती: आष्टा से पाली तक 383 किमी, श्योपुर में प्रवाह घटा।
  • क्वारी: शिवपुरी से मुरैना तक 200 किमी, मुरैना में बहाव कम।
  • सिंध: सिरोज से जालौन तक 470 किमी, धारा टूटने लगी।
  • बावनथड़ी: सिवनी से निकलकर दम तोड़ रही।
  • टमस: मैहर और सतना क्षेत्र में सूखने की कगार पर।
  • कान्ह: इंदौर में अब नाले में तब्दील।
  • नर्मदा: अमरकंटक से खंभात तक 1312 किमी, रेत माफिया के कब्जे में।
  • ताप्ती: मुलताई से खंभात तक 724 किमी, जल परियोजनाओं पर निर्भर।
  • स्वर्णरेखा: ग्वालियर की ऐतिहासिक नदी अब अस्तित्वहीन।

भूजल स्तर में भारी गिरावट

जल शक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के 317 विकासखंडों में से 26 को अत्यधिक जल शोषण की श्रेणी में रखा गया है। 2020-21 की ग्राउंड वॉटर ईयरबुक के अनुसार, प्रदेश में 63.24 प्रतिशत स्थानों पर भूमिगत जल स्तर गिरा है।

जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार भूजल दोहन की दर हर साल 12 प्रतिशत बढ़ रही है। अनुमान है कि 2030 तक जल स्तर 3.9 से 8.8 मीटर तक गिर सकता है।

प्रदेश इस समय जल संकट के गंभीर मोड़ पर खड़ा है। जल जीवन मिशन जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं में हुए भ्रष्टाचार और लापरवाही ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। यदि अब भी कड़े कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में जल संकट भयावह रूप ले सकता है।