सुप्रीम कोर्ट

गणेश पाण्डेय, भोपाल सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा नेता और पूर्व मंत्री कुंवर विजय शाह की सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी पर की गई अभद्र टिप्पणी को बेहद आपत्तिजनक और गंभीर माना है। कोर्ट ने शाह की ओर से मांगी गई माफी को सिरे से खारिज करते हुए कहा, “आपने जिस तरह की घटिया टिप्पणियां की हैं, वह पूरी तरह से बिना सोचे-समझे की गई हैं… हमें इस माफी की जरूरत नहीं है।”

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि शाह की टिप्पणियों ने न केवल एक महिला सैन्य अधिकारी की गरिमा को ठेस पहुंचाई है, बल्कि देश की सैन्य प्रतिष्ठा को भी सवालों के घेरे में खड़ा किया है। कोर्ट ने कहा कि शाह सार्वजनिक जीवन में हैं, ऐसे में उन्हें और अधिक संयम, परिपक्वता और ज़िम्मेदारी का परिचय देना चाहिए था।

एसआईटी गठित करने के आदेश, गिरफ्तारी पर अस्थायी रोक

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए मध्य प्रदेश कैडर के तीन वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की एक विशेष जांच टीम (एसआईटी) गठित करने का आदेश दिया है। अदालत ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया है कि वे अगले 24 घंटे के भीतर एसआईटी का गठन करें। साथ ही अदालत ने कहा, “हम इस जांच पर बहुत करीबी निगरानी रखना चाहेंगे।”

इस दौरान अदालत ने कुंवर विजय शाह की गिरफ्तारी पर अस्थायी रोक जरूर लगाई है, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया कि यह राहत स्थायी नहीं है और केवल जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए दी गई है।

कर्नल कुरैशी को लेकर विवादास्पद टिप्पणी

गौरतलब है कि कर्नल सोफिया कुरैशी ने हाल ही में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बारे में मीडिया को जानकारी दी थी। यह सैन्य अभियान भारत द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ की गई एक सीमापार कार्रवाई थी। विजय शाह ने इस पर आपत्तिजनक और व्यक्तिगत टिप्पणी की थी, जिसे व्यापक स्तर पर आलोचना का सामना करना पड़ा। याचिका में इस टिप्पणी को महिला और सैन्य अधिकारियों के सम्मान के खिलाफ बताते हुए कठोर कार्रवाई की मांग की गई थी।

माफी पर अदालत का कड़ा रुख

कोर्ट में शाह की ओर से एक लिखित माफीनामा पेश किया गया, जिसे पीठ ने अस्वीकार कर दिया। जजों ने टिप्पणी की, “उन्होंने अपने शब्दों के लिए माफी मांगकर न्यायालय की कोई अवमानना नहीं की है। उनकी माफी महज़ एक औपचारिकता है, जिसमें आत्मस्वीकृति और पश्चात्ताप का अभाव है।”

राज्य सरकार की भूमिका पर भी सवाल

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार और पुलिस की निष्क्रियता पर भी कड़े सवाल खड़े किए। अदालत ने पूछा, “एफआईआर दर्ज करने के बाद आपने क्या किया? क्या एसएचओ ने यह जांच की कि किस तरह का अपराध बनता है? स्थिति क्या है?” कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य को अब तक “कुछ और” कर लेना चाहिए था।

जनप्रतिनिधियों से अधिक ज़िम्मेदारी की अपेक्षा

अदालत ने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों की भूमिका केवल भाषण देने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनसे नैतिक उदाहरण पेश करने की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में सार्वजनिक मंचों पर की गई बयानबाज़ी का समाज पर गहरा असर पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश एक महत्वपूर्ण संकेत है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी की गरिमा को ठेस पहुंचाने की इजाजत नहीं दी जा सकती, विशेषकर जब वह व्यक्ति संवैधानिक पद पर रह चुका हो। अब यह देखना होगा कि एसआईटी की जांच किस दिशा में जाती है और विजय शाह को अपने बयानों की कितनी कीमत चुकानी पड़ती है।