गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्य प्रदेश के जंगल अब खुद बोलेंगे- वो भी गूगल क्लाउड और सैटेलाइट की जुबान में। पेड़ काटे गए? जमीन खोदी गई? निर्माण शुरू हो गया? अब यह सब छिपाना नामुमकिन होगा। प्रदेश के पांच वन मंडलों में एक नई तकनीकी क्रांति quietly शुरू हो चुकी है और इसके पीछे हैं 2016 बैच के आईएफएस अधिकारी अक्षय राठौर।

राठौर ने एक ऐसा सिस्टम बनाया है जो न सिर्फ पेड़ों की हरकतें दर्ज करता है, बल्कि इंसानी चालबाजियों को भी बेनकाब करता है। इस सिस्टम का नाम है AI आधारित ‘रियल-टाइम फॉरेस्ट अलर्ट सिस्टम’ और यह सिर्फ तकनीकी नवाचार नहीं, बल्कि जंगलों की आत्मरक्षा का आधुनिक हथियार बन गया है।
गुना, शिवपुरी, विदिशा, बुरहानपुर और खंडवा में यह सिस्टम बतौर पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया था। परिणाम इतने सटीक और तेज़ निकले कि अब 7 जून से इसे पूरे प्रदेश में लागू करने की तैयारी है।
क्या करता है ये सिस्टम?
सिस्टम गूगल अर्थ इंजन पर चलता है, जहां तीन अलग-अलग तारीखों की सैटेलाइट इमेज का मिलान होता है। अगर कहीं भी 10×10 मीटर के दायरे में पेड़ों की कमी, भूमि का बदलता रंग या कोई नई आकृति नजर आती है, तो सिस्टम अलर्ट भेज देता है। यह अलर्ट सीधे मोबाइल ऐप के जरिए फील्ड कर्मचारियों तक पहुंचता है; अब अधिकारी के बहाने नहीं चलेंगे, जमीन पर जाना ही होगा।

जंगल के रक्षक भी अब रडार पर
सिर्फ अतिक्रमणकारी ही नहीं, जो वन कर्मचारी काम में लापरवाही बरतते हैं, वे भी इस सिस्टम की नजर में आ जाते हैं। यह सिस्टम उनके द्वारा दी गई जानकारी की पुष्टि भी करता है। मतलब; नज़र अब दोनों तरफ है।
गुना: संवेदनशील शुरुआत
इस नवाचार की शुरुआत गुना से हुई, जहां जंगलों पर कब्जे को लेकर कई बार खूनी संघर्ष हुए हैं। पन्हेटी, फतेहगढ़, सिरसी जैसे इलाकों में वर्षों से वन भूमि विवादों का केंद्र रहे हैं। अब यहां टेक्नोलॉजी ने एंट्री मारी है; और उम्मीद की जा रही है कि यह इतिहास दोहराया नहीं जाएगा।

आने वाले दिन और भी हाईटेक
IFS राठौर ने बताया कि जल्द ही इसमें ड्रोन तकनीक भी जोड़ी जाएगी। इससे निगरानी और भी सटीक हो जाएगी। यह प्रणाली सैटेलाइट इमेजिंग, मोबाइल फीडबैक और मशीन लर्निंग के त्रिकोण पर चलती है; यानी ‘देखो, जानो और कार्रवाई करो’।
एक मॉडल जो देश के लिए उदाहरण बन सकता है
देश में यह पहली बार हुआ है कि जंगलों की निगरानी के लिए AI को इस तरह नियोजित किया गया है। यह पहल सिर्फ एक सिस्टम नहीं, बल्कि एक संकेत है; अब जंगल अकेले नहीं हैं, तकनीक उनके साथ है।
