2025 में 23 वन अधिकारी होंगे रिटायर

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सेन्ट्रल इम्पॉवर्ड कमेटी के सचिव चंद्र प्रकाश गोयल ने लिखा पत्र, राज्य सरकार से 24 जून 2024 का आदेश रद्द कर पुराने आदेश लागू करने की मांग

गणेश पाण्डेय, भोपाल भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारियों की वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट (एपीएआर) की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश के बाद सेन्ट्रल इम्पॉवर्ड कमेटी (CEC) ने मध्य प्रदेश सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है। CEC के सचिव चंद्र प्रकाश गोयल ने गुरुवार को राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिखते हुए आग्रह किया कि राज्य शासन द्वारा 24 जून 2024 को जारी किया गया आदेश रद्द किया जाए और इसके स्थान पर 22 सितम्बर 2000 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित व्यवस्था का पालन सुनिश्चित किया जाए।

यह पत्र सुप्रीम कोर्ट के 21 मई 2025 के फैसले के एक दिन बाद भेजा गया है, जिसमें न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 29 जून 2004 का विवादित आदेश, 22 सितम्बर 2000 के ‘संतोष भारती बनाम भारत सरकार’ मामले में पारित निर्णय का उल्लंघन है और इसे रद्द माना जाए।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश:
सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय में कहा कि 2004 का आदेश न केवल पूर्ववर्ती निर्णयों के विपरीत है, बल्कि यह नियम विरुद्ध भी है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश इस आदेश की तिथि से एक माह के भीतर पुराने आदेश के अनुसार कार्यवाही करें और यदि कोई विचलन हो, तो उन्हें संशोधित किया जाए।

CEC का आग्रह:
अपने पत्र में CEC सचिव गोयल ने लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अक्षरशः पालन सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि अधिकांश राज्य पहले से ही 2000 के आदेश के अनुसार कार्य कर रहे हैं और मध्य प्रदेश को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि राज्य का आदेश सर्वोच्च न्यायालय की भावना के अनुरूप हो।

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राज्य सरकार पर दबाव:
अब मध्य प्रदेश शासन पर दबाव है कि वह 24 जून 2024 को जारी किए गए विवादित आदेश को वापस लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुरूप नई व्यवस्था लागू करे। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, इस पत्र के बाद संबंधित विभागों में उच्च स्तरीय बैठकें शुरू हो गई हैं और कानूनी पहलुओं की समीक्षा की जा रही है।

प्रशासनिक हलकों में हलचल:
वन विभाग, सामान्य प्रशासन और कार्मिक विभाग में इस पत्र के बाद हलचल है। वरिष्ठ अधिकारियों ने संबंधित फाइलों की समीक्षा शुरू कर दी है और संभावित संशोधन की दिशा में विचार-विमर्श किया जा रहा है।

विशेषज्ञों की राय:
प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि CEC का यह पत्र सिर्फ मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों के लिए भी एक चेतावनी है कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को नज़रअंदाज़ न करें। इसके अनुपालन में देरी राज्य सरकार की वैधानिक स्थिति को कमजोर कर सकती है।