वन भूमि पर कब्जे की कोशिश पर विवाद: डीएफओ ने किया खुला विरोध, पीसीसीएफ ने दिए पट्टे निरस्त करने के निर्देश

गणेश पाण्डेय, भोपाल। रीवा-शहडोल हाईवे से सटी करीब 6 एकड़ वन भूमि को कथित रसूखदार व्यक्तियों के नाम पर वैध करवाने के लिए वन विभाग के भीतर ही रस्साकशी शुरू हो गई। मंत्रालय से लेकर मुख्यालय तक बैठे उच्चाधिकारियों द्वारा दक्षिण शहडोल की डीएफओ श्रद्धा पेंद्रे पर दबाव बनाया गया कि वे कथित पट्टों को वैध माने और भूमि को डिनोटिफाई करें। लेकिन डीएफओ ने दस्तावेजों के साथ पूरे मामले को वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष रख दिया और स्पष्ट किया कि यह भूमि आज भी आरक्षित वन क्षेत्र में दर्ज है।

डीएफओ पेंद्रे ने अपने प्रतिवेदन में बताया कि ग्राम रोहनिया, खसरा नंबर 106/5 का नया खसरा 17/1, 17/2 और 17/3 कुल मिलाकर 5.86 एकड़ क्षेत्र में दर्ज है, जिसे श्रीमती ममता सिंह, श्रीमती माधुरी सिंह और दिनेश पांडे द्वारा कब्जे का दावा किया गया है। लेकिन वर्ष 1974 के दस्तावेजों में उक्त भूमि राम अवतार पिता बृजमोहन के नाम पर दर्ज थी। डीएफओ ने यह भी उल्लेख किया कि इन नए दावेदारों द्वारा कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए हैं, जिससे उनका स्वामित्व स्थापित हो सके।

डीएफओ के अनुसार, यह भूमि वन खंड रोहनिया-1 में दर्ज है, जो रीवा राज दरबार के 1933 के नोटिफिकेशन के तहत आरक्षित घोषित की गई थी। भूमि की वास्तविक स्थिति दर्शाते हुए डीएफओ ने आज की तारीख में सघन वन क्षेत्र की फोटोग्राफ्स भी अपने प्रतिवेदन के साथ संलग्न की हैं।

राजनीतिक पहुंच ने बनाया वन भूमि को विवादित

मामला तब तूल पकड़ा जब मनोज सिंह, सुधीर सिंह और दिनेश पांडे जैसे राजनीतिक रसूख रखने वाले लोगों ने रीवा-शहडोल हाईवे निर्माण के बाद इस जंगल भूमि पर पट्टे का दावा कर दिया। उन्होंने वन विभाग को आवेदन देकर कहा कि इस भूमि को डिनोटिफाई कर उन्हें सौंपा जाए।

अपर मुख्य सचिव (वन) अशोक वर्णवाल ने इस मुद्दे को टाइम लिमिट बैठक में प्रमुख एजेंडा के रूप में शामिल कर लिया और हर मंगलवार को होने वाली बैठकों में वन अधिकारियों पर इस मामले को हल करने का दबाव डालने लगे। इसके चलते सीएफ शहडोल द्वारा भी डीएफओ और रेंजर पर लगातार दबाव बनाया गया, जिससे विभागीय स्तर पर तीखा विवाद उत्पन्न हो गया।

मामला बढ़ने पर पीसीसीएफ (संरक्षण) मनोज अग्रवाल को हस्तक्षेप करना पड़ा। जब डीएफओ ने उनके समक्ष दस्तावेज पेश किए, तो पीसीसीएफ ने साफ निर्देश दिए कि कलेक्टर शहडोल को पत्र लिखकर इन कथित पट्टों को निरस्त करने की कार्रवाई तत्काल की जाए।

डीएफओ का स्पष्ट रुख, अफसरों के दबाव में नहीं झुकीं

डीएफओ श्रद्धा पेंद्रे पूरे घटनाक्रम के दौरान न केवल अपने रुख पर अडिग रहीं, बल्कि दस्तावेजों के साथ यह भी साबित किया कि उक्त भूमि वन विभाग के अधीन है और किसी भी प्रकार से डिनोटिफाई नहीं की जा सकती। उन्होंने भोपाल लौटने के बाद कलेक्टर शहडोल को पत्र लिखकर स्पष्ट निर्देशों के अनुसार आगे की कार्रवाई करने की बात कही है।

इस मामले ने वन विभाग की आंतरिक कार्यप्रणाली और मंत्रालय स्तर पर हो रहे हस्तक्षेप को उजागर कर दिया है। एक ओर जहां मंत्रालय से दबाव बनाकर भूमि को वैध कराने की कोशिश हो रही थी, वहीं जमीनी स्तर पर एक महिला वन अधिकारी ने नियमों और दस्तावेजों के बल पर पूरे मामले को सामने लाकर एक मिसाल पेश की है।