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एक माह बाद भी शासन का संशोधित आदेश जारी नहीं, बन सकती है अवमानना

गणेश पाण्डेय, भोपाल। भारतीय वन सेवा (IFS) के अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (एपीएआर) प्रणाली में सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद मध्यप्रदेश शासन ने अब तक पालन आदेश जारी नहीं किया है21 मई 2025 को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति मसीह की पीठ ने राज्य शासन के 29 जून 2024 को जारी आदेश को रद्द कर 22 सितंबर 2000 के पुराने आदेश को यथावत लागू करने का निर्देश दिया था। साथ ही, आदेश के पालन की रिपोर्ट एक माह के भीतर मांगी गई थी।

आदेश की अनदेखी, अफसरों में नाराजगी

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद शासन की ओर से न तो 29 जून 2024 का आदेश रद्द किया गया और न ही नया आदेश जारी किया गया है। इससे आईएफएस बिरादरी में असंतोष और असमंजस की स्थिति है।

सूत्रों के अनुसार, आईएफएस अधिकारियों का मानना है कि यह मसला वन सेवा की स्वतंत्रता और गरिमा से जुड़ा है, जिसे शासन स्तर पर व्यक्तिगत अहं का विषय बना दिया गया है। एसीएस वन अशोक वर्णवाल द्वारा फैसले को लागू न करना, न्यायालय की अवमानना की स्थिति बना सकता है।

न्यायालय ने स्पष्ट कहा — आदेश अवमाननापूर्ण

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि 29 जून 2024 का आदेश न्यायालय के 22 सितंबर 2000 और 19 अप्रैल 2024 के आदेशों का उल्लंघन करता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि—

“हमें यह मानने में कोई संकोच नहीं कि यह आदेश अवमाननापूर्ण है और स्पष्टीकरण या संशोधन मांगे बिना जारी किया गया।”
“यह आदेश रद्द किया जाना चाहिए।”

एपीएआर में कलेक्टर या प्रमुख सचिव की टिप्पणी नहीं

न्यायालय के इस निर्णय के बाद अब डीएफओ और एपीसीसीएफ जैसे फील्ड लेवल के अफसरों के एपीएआर में कलेक्टर, कमिश्नर या अन्य प्रशासनिक अधिकारी टिप्पणी नहीं लिख सकेंगे। केवल वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ही मूल्यांकन करेंगे। इससे IFS सेवा की स्वतंत्रता सुनिश्चित होगी।

सीईसी सचिव ने भी मुख्य सचिव को लिखा पत्र

22 मई 2025 को ही सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) के सचिव चंद्र प्रकाश गोयल ने राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर आदेशों का तत्काल पालन करने को कहा था। लेकिन अब तक न तो कोई अनुपालन रिपोर्ट भेजी गई, न ही आदेश रद्द किया गया।

एसोसिएशन की अपील — आदेश लागू करें

IFS एसोसिएशन के कई वरिष्ठ सदस्यों ने उम्मीद जताई है कि मुख्य सचिव व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप कर संविधान और न्यायपालिका की गरिमा के अनुरूप आदेश का तत्काल पालन कराएंगे।