पेंशन, स्वत्व भुगतान और अनुकम्पा नियुक्ति से वंचित संध्या द्विवेदी, जांच रिपोर्ट के बावजूद प्रशासन खामोश
गणेश पाण्डेय, भोपाल। रीवा जिले के त्यौथर ब्लॉक में पदस्थ रहे ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (BMO) डॉ. रावेन्द्र प्रसाद द्विवेदी के निधन को सत्रह वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन उनकी पत्नी संध्या द्विवेदी अब तक पेंशन, स्वत्व भुगतान और अनुकम्पा नियुक्ति जैसी बुनियादी विधिक सुविधाओं से वंचित हैं। संवेदनहीन प्रशासनिक रवैये के चलते यह मामला वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ा है, जबकि दस्तावेजों और जांच रिपोर्टों से नॉमिनी की स्थिति स्पष्ट है।
दिवंगत सेवाकाल में, नॉमिनी घोषित पत्नी फिर भी उपेक्षित
डॉ. रावेन्द्र द्विवेदी का निधन 2 अप्रैल 2007 को संजय गांधी स्मृति अस्पताल में हुआ। वे सेवा में रहते हुए त्यौथर के BMO पद पर कार्यरत थे। उनके निधन के बाद पत्नी संध्या द्विवेदी ने विधिवत रूप से उनके नॉमिनी होने से संबंधित सभी दस्तावेज सीएमएचओ रीवा को सौंपे। उन्होंने बताया कि सेवा पुस्तिका में स्वयं, पुत्र शशांक द्विवेदी और पुत्री आशना द्विवेदी का नाम नॉमिनी के रूप में दर्ज है। इसके बावजूद उन्हें आज तक न तो पेंशन मिली, न स्वत्व भुगतान और न ही अनुकम्पा नियुक्ति का लाभ।
जांच रिपोर्ट ने भी नहीं बदली अफसरों की संवेदनहीनता
प्रशासन की ओर से चार सदस्यीय जांच समिति गठित की गई थी, जिसने 8 मई 2007 को नॉमिनी सत्यापन रिपोर्ट सीएमएचओ रीवा को सौंप दी थी। रिपोर्ट में संध्या द्विवेदी को वैध नॉमिनी के रूप में स्पष्ट किया गया था। इसके बावजूद विभाग ने न कोई भुगतान किया और न ही अनुकम्पा नियुक्ति की दिशा में कोई पहल की। खास बात यह है कि नॉमिनी को लेकर किसी अन्य पक्ष ने अब तक कोई दावा नहीं किया है और ना ही न्यायालय से कोई रोक लगी है।
कलेक्टर, संभागायुक्त से लेकर सीएमएचओ तक को दिए आवेदन
संध्या द्विवेदी ने बताया कि उन्होंने रीवा के कलेक्टर, संभागायुक्त और सीएमएचओ कार्यालय तक सभी संबंधित अधिकारियों को आवेदन दिए, लेकिन हर बार मामला “विचाराधीन” या “कागज अपूर्ण” कहकर टाल दिया गया। उनके अनुसार उन्हें पति की मृत्यु सहायता राशि तक नहीं मिली।
परिवार आर्थिक संकट में, बच्चों की परवरिश भी मुश्किल
इस लापरवाही का सबसे बड़ा असर संध्या द्विवेदी और उनके बच्चों पर पड़ा है। पति की मौत के बाद लगातार आर्थिक तंगी झेल रही संध्या का कहना है कि “बच्चों की पढ़ाई और पालन-पोषण कर पाना भी अब मुश्किल हो गया है। कभी लगता है कि विधवा होना ही सबसे बड़ा अपराध बन गया है।”
प्रशासनिक जवाबदेही तय होनी चाहिए
यह मामला न सिर्फ एक पीड़ित महिला की न्याय की प्रतीक्षा की कहानी है, बल्कि सरकारी तंत्र की लापरवाही और अमानवीयता को भी उजागर करता है। यदि सेवा पुस्तिका, जांच रिपोर्ट और नॉमिनी दस्तावेज होने के बावजूद भुगतान और सहायता नहीं दी जा रही है, तो यह सवाल प्रशासन की संवेदनशीलता और जवाबदेही पर खड़ा करता है।
क्या कहता है सेवा नियमावली का प्रावधान?
राज्य सरकार के सेवा नियमों के अनुसार, किसी अधिकारी की सेवाकाल में मृत्यु होने पर उनके द्वारा नामित नॉमिनी को त्वरित रूप से पेंशन, स्वत्व भुगतान और अनुकम्पा नियुक्ति का हक़ होता है। इस मामले में सभी दस्तावेज होने के बावजूद लंबित स्थिति, स्पष्ट रूप से नियमों की अवहेलना दर्शाती है।
अब क्या आगे की राह?
संध्या द्विवेदी ने अंतिम उम्मीद के तौर पर राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों से न्याय की गुहार लगाई है। उन्होंने कहा, “अब यही आशा है कि मीडिया और सामाजिक संगठनों की मदद से हमारी आवाज़ उन तक पहुंचे, जो न्याय दिला सकते हैं।”
