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फोन-पे लेनदेन के सबूत के बावजूद दोबारा जांच के आदेश, पीड़ित दर-दर भटक रहे, पूर्व जांच में नाकेदार दोषी पाया गया था

गणेश पाण्डेय, भोपाल। सीहोर वन मंडल में कार्यरत दो हेल्परों ने गंभीर आरोप लगाते हुए बताया है कि उन्हें कलेक्टर दर पर नियुक्त किया गया, लेकिन उनका आधा वेतन जबरन वसूला गया। इस वसूली में क्षेत्र के नाकेदार संतोष साहू और उनके सहयोगी हैल्पर कैलाश सोनी का नाम सामने आया है।

पीड़ित हेल्पर जावेद खान और रईस खान का कहना है कि उनसे हर महीने 10,225 रुपये वेतन में से 5 से 7 हजार रुपये तक फोन-पे और नकद वसूले गए। जावेद खान से यह राशि नाकेदार ने अपनी बेटी तेलांशी साहू के नाम पर फोन-पे के जरिए वसूली। दोनों ने जब इसका विरोध किया तो नौकरी से निकालने की धमकी दी गई।

स्क्रीनशॉट और बैंक डिटेल के साथ शिकायत दी, कार्रवाई नहीं

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दोनों हेल्परों ने 17 जून को कलेक्टर और 20 जून को डीएफओ को शपथ पत्र, फोन-पे स्क्रीनशॉट, और बैंक डिटेल्स के साथ लिखित शिकायत की। लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। उल्टा, वर्तमान डीएफओ अर्चना पटेल ने पहले से हुई जांच रिपोर्ट को दरकिनार कर नई जांच शुरू करवा दी

पहले ही दोषी पाया जा चुका है नाकेदार

पूर्व डीएफओ एमएस डाबर ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीओ एल्बिन बर्मन से जांच करवाई थी। जांच में नाकेदार को दोषी पाया गया। लेकिन रिपोर्ट सौंपने के अगले दिन ही डाबर का तबादला हो गया और उनकी जगह प्रमोटी आईएफएस अधिकारी अर्चना पटेल की पोस्टिंग हुई। उन्होंने जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई करने के बजाय उसी एसडीओ को दोबारा जांच सौंप दी, जिससे यह संदेह और गहराता है कि नाकेदार को बचाने की कोशिश की जा रही है।

डीएफओ पर खुद लगे हैं पूर्व में भ्रष्टाचार के आरोप

बताया जा रहा है कि जब अर्चना पटेल सीधी जिले में एसडीओ थीं, तब तेंदूपत्ता घोटाले में लोकायुक्त द्वारा मामला दर्ज किया गया था। जांच में विभाग ने उन्हें केवल चेतावनी और क्लिनिक किट देकर मामला निपटा दिया था। अब सीहोर में भी उनका रवैया सवालों के घेरे में है।

नौ माह का वेतन भी बकाया

पीड़ित रईस खान का कहना है कि नौ महीने से वेतन नहीं दिया गया, जबकि वह लगातार सेवा दे रहा था। वहीं दोनों हेल्परों ने बताया कि फोन कॉल की रिकॉर्डिंग भी मौजूद है, जिसमें नाकेदार संतोष साहू खुलेआम वसूली की बात करते हुए सुनाई दे रहे हैं।

 

विभागीय लीपापोती पर उठे सवाल

मामले में डीएफओ के रवैये से यह प्रतीत होता है कि विभागीय स्तर पर दोषियों को बचाने और पीड़ितों की शिकायतों को दबाने की कोशिश की जा रही है। जबकि शिकायतों के साथ डिजिटल सबूत, रिकॉर्डिंग और गवाह सभी मौजूद हैं। सीहोर वन मंडल का यह मामला न केवल जबरन वसूली और भ्रष्टाचार का है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि जांचों को कैसे प्रभावशाली अधिकारियों द्वारा प्रभावित किया जा सकता है। पीड़ितों को अब तक न्याय नहीं मिला है और वे दर-दर भटकने को मजबूर हैं।