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मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर रातापानी टाइगर रिजर्व घोषित, अन्य प्रस्तावित सेंचुरियों को भी मिल सकता है नया जीवन

गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश को देश में ‘टाइगर स्टेट’ की पहचान दिलाने वाले बाघ अब संकट की स्थिति में हैं। प्रदेश में बाघों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है, लेकिन उन्हें विचरण के लिए पर्याप्त टेरिटरी नहीं मिल रही है। वन क्षेत्रों का संकुचन, मानव अतिक्रमण और पर्यावरणीय असंतुलन जैसे कारणों से बाघ अब सिमटी हुई सीमाओं में रहने को मजबूर हो रहे हैं। इसके चलते आपसी संघर्ष, मानव-वन्यजीव टकराव और इनब्रीडिंग जैसे खतरों में तेजी से वृद्धि हो रही है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बाघों के संरक्षण के लिए निर्णायक पहल की है। उन्होंने सत्ता संभालते ही सबसे पहले रातापानी को टाइगर रिजर्व घोषित कर प्रदेश के वन्यजीव नीति की गंभीरता को दर्शाया। इसके अलावा माधव टाइगर रिजर्व और डॉ. भीमराव अंबेडकर, रानी दुर्गावती, लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर सेंचुरी जैसी प्रस्तावित परियोजनाओं को गति देने की पहल भी की जा रही है।

संकुचित हो रही टेरिटरी: टाइगर पर दबाव
बाघों की मौजूदगी वाले प्रमुख टाइगर रिजर्व की स्थिति निम्नानुसार है:

नेशनल पार्क क्षेत्रफल (वर्ग किमी) बाघों की संख्या (2022)
कान्हा 2117 120
बांधवगढ़ 1530 160
पेंच 1179 80
पन्ना 1597 65
सतपुड़ा 2133 65
संजय 1644 35

इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि बाघों की संख्या अधिक है, लेकिन उनके लिए विस्तृत और सुरक्षित क्षेत्र सीमित होता जा रहा है।

क्या हैं मुख्य समस्याएं?

  1. आवास का नुकसान – अतिक्रमण और मानवीय गतिविधियों के कारण जंगल सिकुड़ रहे हैं।
  2. मानव-वन्यजीव संघर्ष – सीमित क्षेत्र में रहने वाले बाघ अब मानव बस्तियों के निकट आ रहे हैं।
  3. बाघों के आपसी संघर्ष – एक ही क्षेत्र में अधिक बाघों की उपस्थिति टकराव को जन्म देती है।
  4. इनब्रीडिंग का खतरा – सीमित क्षेत्र में रहने से आनुवंशिक विविधता कम हो रही है, जिससे बाघों की प्रजातीय सेहत पर खतरा है।

संरक्षण के प्रयास: नई सेंचुरी की ज़रूरत
डॉ. यादव की सरकार ने इस संकट की गंभीरता को समझते हुए नई सेंचुरियों की योजना बनाई है, जिससे बाघों के लिए वैकल्पिक आवास उपलब्ध हो सके। प्रस्तावित सेंचुरियों में शामिल हैं:

  • सरदार वल्लभ भाई पटेल सेंचुरी, सीहोर
  • महात्मा गांधी अभयारण्य, बुरहानपुर
  • राजा दलपत शाह अभयारण्य, मंडला
  • राजेन्द्र प्रसाद अभयारण्य
  • अहिल्याबाई होल्कर अभयारण्य, इंदौर
  • जमुना देवी अभयारण्य, धार
  • इंदिरा गांधी अभयारण्य, नरसिंहपुर
  • मांधाता सेंचुरी

इन सेंचुरियों के निर्माण से न केवल बाघों को नई टेरिटरी मिलेगी, बल्कि पर्यावरणीय स्थायित्व, जल संरक्षण, हरियाली और ग्रामीण क्षेत्रों में जनहानि की घटनाओं में कमी भी आएगी।

संरक्षण के लाभ

  • जल स्रोतों का संरक्षण
  • ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कमी
  • वनों का पुनर्जीवन
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष में कमी
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संरक्षण आधारित आजीविका का लाभ
  • पर्यावरणीय संतुलन और वनाच्छादन में वृद्धि

प्रदेश में बाघों की बढ़ती संख्या गर्व की बात है, लेकिन उनके लिए सुरक्षित और पर्याप्त टेरिटरी का होना उतना ही आवश्यक है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा नई सेंचुरियों की दिशा में किए गए प्रयास इस दिशा में सार्थक पहल हैं। अब आवश्यकता है केंद्र सरकार, वन विभाग और समाज की सहभागिता की, ताकि प्रदेश का बाघ “जंगल का राजा” सुरक्षित रह सके और मध्यप्रदेश की जैव विविधता समृद्ध हो सके।