Dfo और विधायक विवाद

ड्राइवर और स्थायी कर्मचारी के बयानों से बढ़ी आशंका, जांच की निष्पक्षता पर उठने लगे सवाल

गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश के बहुचर्चित विधायक-डीएफओ अड़ीबाजी विवाद ने अब नया मोड़ ले लिया है। बालाघाट की डीएफओ नेहा श्रीवास्तव द्वारा विधायक अनुभा मुंजारे पर रिश्वत मांगने का आरोप लगाए जाने के बाद गठित जांच कमेटी की प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में आ गई है। सवाल उठ रहा है कि क्या कमेटी केवल डीएफओ के करीबी ड्राइवर और स्थायी कर्मचारी के बयानों के आधार पर ही रिपोर्ट तैयार करेगी?

सूत्रों का कहना है कि जांच कमेटी की प्रमुख कमोलिका मोहंता ने दो डीएफओ, विधायक और अन्य लोगों समेत पांच व्यक्तियों के बयान दर्ज किए। आश्चर्य की बात यह रही कि विधायक को छोड़कर बाकी सभी बयान डीएफओ नेहा श्रीवास्तव के पक्ष में गए। इससे यह चर्चा तेज हो गई है कि जांच का रुख पहले से ही तय माना जा रहा है।

ड्राइवर और स्थायी कर्मी का बयान बना केंद्र बिंदु

जांच के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा में रहे डीएफओ नेहा श्रीवास्तव के ड्राइवर मुरारी लाल कोरी और फॉरेस्ट रेस्ट हाउस (एफआरएच) के स्थायी कर्मचारी चुन्नीलाल ऐड़े। दोनों ने अपने-अपने बयान में सीधे तौर पर विधायक के खिलाफ आरोप लगाने से बचते हुए गोलमोल जवाब दिए।

सूत्र बताते हैं कि कोरी ने कहा—”मैं बाहर था, लेकिन तेज आवाज में कुछ बातें सुनीं, जिसमें पेटी और लेनदेन का जिक्र था।” वहीं चुन्नीलाल ऐड़े ने भी लगभग ऐसा ही बयान दिया। दिलचस्प पहलू यह भी है कि मुरारी लाल कोरी कभी खुद जांच अधिकारी मोहंता का भी ड्राइवर रह चुका है। ऐसे में निष्पक्षता को लेकर कई तरह की शंकाएं खड़ी हो गई हैं।

शिकायत और विवाद की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि डीएफओ नेहा श्रीवास्तव ने 18 अगस्त को पीसीसीएफ भोपाल को पत्र लिखकर विधायक अनुभा मुंजारे पर गंभीर आरोप लगाए थे। उनका कहना था कि 16 अगस्त को सार्वजनिक अवकाश होने के बावजूद उन्हें बालाघाट स्थित फॉरेस्ट रेस्ट हाउस बुलाया गया।

शिकायत पत्र में उल्लेख है कि वहां विधायक ने निजी स्टाफ और सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी में 2-3 पेटी अवैध पैसों की मांग की। पैसे न देने पर विधायक ने कथित तौर पर न केवल उन्हें बल्कि उनके परिवार को भी अपमानजनक और असंयमित भाषा का शिकार बनाया।

जांच पर उठ रहे सवाल

जांच कमेटी ने जिस तेजी से बयान दर्ज कर पूरे प्रकरण को निपटाया, उसने कई विशेषज्ञों को हैरान किया है। कहा जा रहा है कि भोपाल से बालाघाट तक की यात्रा में जितना समय लगता है, उससे भी कम वक्त में जांच पूरी कर ली गई। इससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि रिपोर्ट डीएफओ के पक्ष में तैयार की जाएगी।

तबादला प्रक्रिया भी ठप

इस विवाद का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि डीएफओ दंपत्ति—नेहा श्रीवास्तव और उनके पति डीएफओ अधर गुप्ता—का तबादला फिलहाल टलता दिख रहा है। सूत्रों का कहना है कि एसीएस अशोक वर्णवाल फिलहाल दोनों को हटाने के मूड में नहीं हैं।

हालांकि, यह भी सच है कि मंत्रालय में पिछले एक महीने से उनका तबादला प्रस्ताव लंबित है। इससे पहले पूर्व सीसीएफ अरविंदम सिंह सेंगर ने दोनों अधिकारियों के खिलाफ आरोप पत्र भेजा था। लेकिन सेंगर का ही तबादला ग्वालियर कर दिया गया। इस घटनाक्रम ने पूरे मामले को और अधिक पेचीदा बना दिया है।

विधायक और डीएफओ के बीच का यह विवाद महज रिश्वतखोरी का मामला नहीं रहा, बल्कि अब यह जांच की पारदर्शिता और प्रशासनिक दबाव का भी सवाल बन गया है। ड्राइवर और स्थायी कर्मचारी के बयानों पर निर्भर यह जांच क्या वास्तव में न्यायसंगत मानी जाएगी, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।