दो सदस्यीय समिति अब तक नहीं सौंप पाई रिपोर्ट, सात लोगों के बयान दर्ज, जांच टीम की कार्यप्रणाली पर संदेह
गणेश पाण्डेय, भोपाल। कांग्रेस विधायक अनुभा मुंजारे और डीएफओ नेहा श्रीवास्तव के बीच हुए विवाद की जांच को अब एक माह से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन मामला अब भी अधूरा है। वन विभाग द्वारा गठित दो सदस्यीय जांच समिति अभी तक अपना प्रतिवेदन राज्य शासन को नहीं सौंप पाई है। नियत अवधि में जांच पूरी न होने पर अब कार्यवाही की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं।
डीएफओ ने विधायक पर लगाए थे गंभीर आरोप
18 अगस्त को डीएफओ नेहा श्रीवास्तव ने पीसीसीएफ भोपाल को एक पत्र भेजकर विधायक अनुभा मुंजारे पर गंभीर आरोप लगाए थे।
डीएफओ के अनुसार, 16 अगस्त को सार्वजनिक अवकाश के दिन उन्हें बालाघाट स्थित फॉरेस्ट रेस्ट हाउस बुलाया गया, जहां विधायक ने निजी स्टाफ और सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी में “दो-तीन पेटी अवैध पैसों” की मांग की।
उन्होंने यह भी कहा कि पैसे देने से इनकार करने पर विधायक ने उनके और उनके परिवार के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया।
इस शिकायत के बाद वन विभाग ने 3 सितंबर को मामले की जांच के लिए एक दो सदस्यीय समिति गठित की। इसमें अपर प्रधान मुख्य वनसंरक्षक कमलिका मोहन्ता (आईएफएस 1997 बैच) और वन संरक्षक बैतुल वासु कनोजिया को शामिल किया गया। दोनों अधिकारियों को 15 दिन में जांच पूरी कर प्रतिवेदन सौंपने के निर्देश दिए गए थे।
सात लोगों के बयान दर्ज, रिपोर्ट अब भी लंबित
सूत्रों के अनुसार, 12 सितंबर को जांच अधिकारी बालाघाट पहुंचे और इस दौरान सीएफ गौरव चौधरी, डीएफओ नेहा श्रीवास्तव, डीएफओ अधर गुप्ता, वाहन चालक मुरारीलाल कोरी, रेस्ट हाउस कर्मचारी चुन्नीलाल ऐड़े, विधायक अनुभा मुंजारे, गनमैन और अब्बू शाह के बयान दर्ज किए गए।
इस तरह अब तक कुल सात लोगों के बयान हो चुके हैं, लेकिन जांच रिपोर्ट अभी तक तैयार नहीं की गई है।
16 अक्टूबर को ठेकेदार फहीम खान के बयान की तैयारी
अब इस विवाद में ठेकेदार फहीम खान का नाम भी सामने आया है। उन्हें 16 अक्टूबर को भोपाल बुलाया गया है, जहां उनके बयान दर्ज किए जाएंगे।
डीएफओ नेहा श्रीवास्तव ने अपने बयान में कहा है कि वे ठेकेदार फहीम को नहीं पहचानतीं, और उन्हें केवल ट्रू कॉलर पर फहीम नाम दिखा था।
जबकि फहीम खान वन विभाग में कई निर्माण कार्यों के ठेके ले चुके हैं। ऐसे में डीएफओ का यह बयान नए सवाल खड़े कर रहा है कि आखिर वे ठेकेदार को पहचानती क्यों नहीं हैं?
जांच में देरी से बढ़ा शक
वन विभाग के आदेश के अनुसार समिति को 15 दिनों में रिपोर्ट सौंपनी थी, लेकिन अब आदेश को एक माह दस दिन से अधिक हो चुके हैं।
विभागीय सूत्रों का कहना है कि जांच अधिकारी संभवतः किसी को बचाने की कोशिश में देरी कर रहे हैं। इससे यह भी संभावना जताई जा रही है कि मामले के सेटलमेंट की प्रक्रिया चल रही है और रिपोर्ट उसी हिसाब से तैयार की जा सकती है।
जांच में देरी होने से यह पूरा मामला अब संदेह के घेरे में आ गया है और जांच समिति की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है।
📌 किसे बचाया जा रहा है?
वन विभाग ने 3 सितंबर को आदेश जारी कर दो सदस्यीय समिति को दो सप्ताह में जांच पूरी करने के निर्देश दिए थे। अब 40 दिन से अधिक बीत चुके हैं, लेकिन रिपोर्ट नहीं दी गई। सवाल यह है कि जांच में इतनी देरी आखिर किसे बचाने के लिए की जा रही है?
