आलोक पाठक के रिटायर होते ही खाली हुई कुर्सी, अतिरिक्त प्रभार पर वन विभाग में असमंजस
गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश वन विभाग में उज्जैन वन वृत्त के वन संरक्षक पद को लेकर प्रशासनिक निर्णय में देरी चर्चा का विषय बन गई है। वन संरक्षक आलोक पाठक सोमवार शाम 5 बजे सेवानिवृत्त हुए, लेकिन मंगलवार दोपहर तक यह स्पष्ट नहीं हो सका था कि पूर्णकालिक नियुक्ति होने तक वन संरक्षक का अतिरिक्त प्रभार किस अधिकारी को सौंपा जाएगा। महत्वपूर्ण पद पर अधिकारी की सेवानिवृत्ति पहले से निर्धारित होने के बावजूद तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था का आदेश जारी नहीं होने को लेकर विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। खास तौर पर इसलिए भी कि उज्जैन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का गृह जिला है।
अतिरिक्त प्रभार देना विभाग में नई बात नहीं
वन विभाग में वन संरक्षक के पद पर नियमित पदस्थापना होने तक किसी सक्षम अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार सौंपना नई व्यवस्था नहीं है। प्रदेश के कई वन वृत्तों में अलग-अलग समय पर अतिरिक्त प्रभार के जरिए प्रशासनिक कामकाज संचालित किया जाता रहा है। विभागीय जानकारी के अनुसार भोपाल, ग्वालियर, रीवा और सिवनी जैसे वन वृत्तों में भी वन संरक्षक स्तर के पद अतिरिक्त प्रभार के सहारे संचालित होने के उदाहरण हैं।
ऐसे में उज्जैन में पद रिक्त होने के बाद तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होने को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, केवल कुछ घंटे की देरी से प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हुई है, यह निष्कर्ष निकालना भी जल्दबाजी होगी।
वर्किंग प्लान अधिकारियों को भी मिल चुका है प्रभार
पिछले कुछ समय में वन विभाग में वर्किंग प्लान से जुड़े अधिकारियों सहित अन्य वन अधिकारियों को भी वन संरक्षक का अतिरिक्त प्रभार दिए जाने के मामले सामने आए हैं। इससे यह स्पष्ट है कि विभाग जरूरत के अनुसार उपलब्ध अधिकारियों में से किसी को अस्थायी जिम्मेदारी सौंप सकता है।
यही वजह है कि उज्जैन में संभावित अधिकारियों के नाम को लेकर विभागीय स्तर पर चर्चा तेज है। सवाल यह है कि जब अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था विभाग में पहले भी अपनाई जाती रही है, तो उज्जैन के मामले में आदेश जारी करने में देरी क्यों हुई।
एक प्रभावशाली आईएफएस अधिकारी के दबाव की चर्चा
विभागीय गलियारों में उज्जैन के अतिरिक्त प्रभार को लेकर एक प्रभावशाली आईएफएस अधिकारी के हस्तक्षेप की चर्चा भी है। कुछ सूत्रों का दावा है कि संबंधित अधिकारी के प्रभाव के चलते प्रभार देने की प्रक्रिया फिलहाल रोकी गई है। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और विभाग की ओर से ऐसी किसी बात की आधिकारिक पुष्टि भी सामने नहीं आई है।
इसलिए इसे तथ्य के बजाय विभागीय चर्चा के रूप में ही देखा जाना चाहिए। यदि वास्तव में किसी अधिकारी के स्तर से निर्णय प्रभावित हो रहा है, तो यह प्रशासनिक प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़ा करेगा। वहीं, यदि ऐसा नहीं है तो विभाग की ओर से अतिरिक्त प्रभार का आदेश जारी करने में देरी का वास्तविक कारण स्पष्ट किया जाना चाहिए।
उत्तराधिकारी की व्यवस्था पहले से क्यों नहीं?
किसी वन संरक्षक की सेवानिवृत्ति अचानक होने वाली घटना नहीं होती। सेवानिवृत्ति की तारीख पहले से निर्धारित होती है। ऐसे में प्रशासनिक दृष्टि से यह अपेक्षा रहती है कि पद रिक्त होने से पहले ही पूर्णकालिक नियुक्ति अथवा अतिरिक्त प्रभार की वैकल्पिक व्यवस्था पर निर्णय ले लिया जाए।
उज्जैन में सोमवार शाम 5 बजे पद रिक्त होने के बाद मंगलवार दोपहर तक आदेश नहीं आने से यही सवाल उठ रहा है कि क्या विभाग ने समय रहते विकल्पों पर विचार नहीं किया था या फिर किसी अधिकारी के नाम पर सहमति नहीं बन पाई।
सिर्फ एक कुर्सी नहीं, पूरे सर्किल का प्रशासन
वन संरक्षक का पद केवल कार्यालयीन पद नहीं है। वन वृत्त के स्तर पर वन संरक्षण, वन अपराध नियंत्रण, वन प्रबंधन, विकास कार्यों की निगरानी और अधीनस्थ वनमंडलों के बीच समन्वय जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में इस स्तर के अधिकारी की भूमिका रहती है।
इसलिए पद रिक्त होने के बाद अतिरिक्त प्रभार की स्पष्ट व्यवस्था प्रशासनिक निरंतरता के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। हालांकि अतिरिक्त प्रभार की अवधि और कामकाज की व्यवस्था विभागीय आदेश पर निर्भर करती है।
भोपाल, रीवा, शहडोल और ग्वालियर के पदों पर भी नजर
उज्जैन का मामला ऐसे समय सामने आया है जब वन विभाग में कई स्तरों पर अतिरिक्त प्रभार और रिक्त पदों को लेकर चर्चा चल रही है। यदि नियमित पदस्थापन में समय लगता है तो अस्थायी प्रभार के जरिए प्रशासनिक कामकाज चलाना विभाग के लिए सामान्य विकल्प है। लेकिन लगातार अतिरिक्त प्रभार से यह सवाल भी उठता है कि क्या विभाग को वन वृत्तों में नियमित पदस्थापन की प्रक्रिया तेज नहीं करनी चाहिए।
अब किसे मिलेगा उज्जैन का प्रभार?
आलोक पाठक की सेवानिवृत्ति के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि उज्जैन वन वृत्त का अतिरिक्त प्रभार किस अधिकारी को दिया जाता है। यदि विभाग जल्द आदेश जारी करता है तो प्रशासनिक निरंतरता बनी रहेगी। वहीं, देरी जारी रहती है तो यह सवाल और गहरा होगा कि आखिर निर्णय लेने में क्या अड़चन है।
फिलहाल किसी प्रभावशाली अधिकारी के दबाव में निर्णय रोके जाने की चर्चा की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इस पहलू पर अंतिम निष्कर्ष विभागीय आदेश या आधिकारिक स्पष्टीकरण के बाद ही निकाला जा सकेगा। फिलहाल मामला उज्जैन वन वृत्त के नए वन संरक्षक अथवा अतिरिक्त प्रभार की घोषणा पर टिका है।
