1994 का आदेश बना ‘दागी अफसरों’ का सुरक्षा कवच
आईबीएन, भोपाल। मध्यप्रदेश में लोकायुक्त की लगातार हो रही छापेमार कार्रवाइयों ने एक बार फिर प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। करोड़ों की काली कमाई, नकदी, सोना और आलीशान संपत्तियों के खुलासे हो रहे हैं लेकिन सवाल अब भी बरकरार है कि इतने पुख्ता सबूतों के बावजूद आरोपी अफसरों को गिरफ्तार क्यों नहीं किया जा रहा?
राज्यभर में बीते कुछ महीनों में लोकायुक्त संगठन ने कई प्रभावशाली अधिकारियों पर बड़ी कार्रवाई की। भोपाल के रिटायर्ड पीडब्ल्यूडी इंजीनियर जी.पी. मेहरा के घर से 36 लाख रुपये नकद, ढाई किलो सोना, 17 टन शहद और करोड़ों की संपत्ति बरामद हुई। वहीं इंदौर के रिटायर्ड आबकारी अधिकारी धर्मेंद्र सिंह भदौरिया के ठिकानों से 10 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जब्त की गई। फिर भी किसी को हिरासत में नहीं लिया गया।
लोकायुक्त का पुराना आदेश बना ढाल
जानकार बताते हैं कि इसके पीछे लोकायुक्त का 23 मई 1994 का आदेश है, जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोपी की गिरफ्तारी सामान्य परिस्थितियों में न की जाए।
गिरफ्तारी केवल तभी हो, जब आरोपी जांच में सहयोग न करे या सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका हो।
यह आदेश उस दौर में इसलिए जारी किया गया था ताकि जांच निष्पक्ष बनी रहे, लेकिन आज यही नियम भ्रष्ट अफसरों के लिए सुरक्षा कवच साबित हो रहा है।
238 ट्रैप केस, लेकिन बड़े अफसर सुरक्षित
लोकायुक्त सूत्रों के अनुसार वित्त वर्ष 2024–25 में अब तक 238 ट्रैप कार्रवाईयाँ की जा चुकी हैं। इनमें से अधिकांश में छोटे कर्मचारी जैसे पंचायत सचिव, पटवारी, लिपिक या क्लर्क गिरफ्तार हुए, जबकि वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ छापे तो पड़े, लेकिन गिरफ्तारी नहीं हुई।
भोपाल लोकायुक्त एसपी दुर्गेश राठौर का कहना है “गिरफ्तारी परिस्थिति पर निर्भर करती है। अगर जांच प्रभावित होने की संभावना नहीं होती, तो गिरफ्तारी को टाल दिया जाता है।” लेकिन कानूनी विशेषज्ञों और पूर्व पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह नीति अब “नरमी की ढाल” बन चुकी है।
“सेवानिवृत्त अफसरों को क्यों मिल रही राहत?”
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब आरोपी सेवानिवृत्त हो चुका है और उसके पास सरकारी शक्ति नहीं है, तो उसे जेल भेजने में कोई कानूनी अड़चन नहीं होनी चाहिए। इसके बावजूद कार्रवाई केवल “कागज़ों” में रह जाती है।
राज्य में बीते दो वर्षों में 100 से अधिक बड़े अफसरों पर छापेमारी हुई, लेकिन गिरफ्तारी “गिनती” की ही हुई है। इससे आम जनता में यह धारणा मजबूत हो रही है कि लोकायुक्त की कार्रवाई केवल दिखावे तक सीमित है।
1994 के आदेश की समीक्षा की जरूरत
कानूनी विश्लेषकों का मानना है कि अब समय आ गया है जब लोकायुक्त को 1994 के आदेश की समीक्षा करनी चाहिए। देश और प्रशासनिक ढांचा बदल चुका है, ऐसे में तीन दशक पुरानी व्यवस्था पर नए सिरे से विचार आवश्यक है। यदि गिरफ्तारी की प्रक्रिया को पारदर्शी और जिम्मेदार बनाया जाए तो भ्रष्टाचार विरोधी संदेश मजबूत होगा। वरना जनता के मन में यह सवाल हमेशा रहेगा कि “सबूत हैं, लेकिन सजा क्यों नहीं?”
लोकायुक्त की कार्रवाईयों ने जनता में उम्मीद तो जगाई है, लेकिन गिरफ्तारी न होने से न्याय अधूरा रह जाता है। तीन दशक पुराना आदेश आज भ्रष्ट अफसरों के लिए सुरक्षा कवच बन गया है। अब वक्त है कि सरकार और लोकायुक्त संस्था दोनों मिलकर नई नीति तैयार करें — जो ईमानदारों को सुरक्षा दे, लेकिन भ्रष्टों को कानून से बचने का अवसर न दे।
