लालबर्रा में बाघ की संदिग्ध मौत आठ दिन तक छुपाई गई, सोशल मीडिया से खुला राज
गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के लालबर्रा वन परिक्षेत्र से एक बार फिर वन विभाग की गंभीर लापरवाही और संदिग्ध भूमिका का सनसनीखेज मामला सामने आया है। दक्षिण बालाघाट वन मंडल के कक्ष क्रमांक 443 में एक टाइगर की संदिग्ध मौत हो गई, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि आठ दिनों तक इस घटना की जानकारी वन विभाग के अधिकारियों को नहीं हो सकी। बाघ का शव पुराना हो चुका था और उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद ही विभागीय अमला हरकत में आया।
शुरुआती जांच में सामने आया है कि बाघ की मौत के बाद डिप्टी रेंजर और फील्ड स्टाफ ने शव को जंगल में ही जलाकर साक्ष्य मिटाने की कोशिश की। इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी न तो तत्कालीन एसडीओ को थी और न ही डीएफओ अधर गुप्ता सक्रिय नजर आए। सबसे बड़ी बात यह है कि विभाग की कार्रवाई में डिप्टी रेंजर और बीट गार्ड सहित पांच कर्मचारियों को निलंबित और बर्खास्त किया गया, लेकिन DFO अधर गुप्ता को किसी भी स्तर पर उत्तरदायी नहीं माना गया। इससे उनके प्रति विभागीय नरमी और पूर्व के विवादों के बावजूद संरक्षण दिए जाने पर सवाल उठने लगे हैं।

घटना का क्रम: बाघ की मौत और सबूत मिटाने की कोशिश
2 अगस्त को जब पोटूटोला–चीतलटोला क्षेत्र से बाघ के सड़े-गले शव की तस्वीरें वायरल हुईं, तब वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को मामले की जानकारी हुई। लेकिन जब टीम मौके पर पहुंची तो शव गायब था। बाद में जांच में यह सामने आया कि शव को कक्ष क्रमांक 443 और 444 की सीमा से तीन किलोमीटर दूर एक अन्य जगह जलाकर नष्ट कर दिया गया था। इस पूरे मामले में डिप्टी रेंजर टीकाराम हनवते, बीट गार्ड घोरमारे को तत्काल निलंबित किया गया, जबकि 4 चौकीदारों को बर्खास्त किया गया। साथ ही आधा दर्जन ग्रामीणों को भी आरोपित किया गया, जो पास के गांव चीतलटोला, नवेगांव, टेकाड़ी और खैरागोंदी से हैं।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि वन विभाग की कार्रवाई पक्षपातपूर्ण है और असल जिम्मेदार अधिकारियों को बचाया जा रहा है। उनका कहना है कि स्थानीय स्तर पर ही मौत को दबाया गया और साक्ष्य मिटाने की कोशिश हुई, जिससे यह स्पष्ट है कि उच्च अधिकारियों की भी जानकारी में यह मामला रहा होगा।
डीएफओ अधर गुप्ता पर सवाल क्यों?
DFO अधर गुप्ता इस पूरे मामले में कहीं भी सक्रिय नहीं दिखे। यही नहीं, उनके खिलाफ पूर्व में भी कई गंभीर आरोप लगे हैं। वर्ष 2021 में शहडोल में पदस्थ रहने के दौरान तत्कालीन संभागायुक्त राजीव शर्मा ने प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर गुप्ता की कार्यशैली पर सवाल उठाए थे। पत्र में यह उल्लेख था कि वे मनमाने ढंग से कार्य करते हैं, आदेशों की अवहेलना करते हैं और मद्यपान की प्रवृत्ति में लिप्त रहते हैं। इस पत्र के आधार पर उन्हें टेरीटोरियल से हटाया गया था, लेकिन इसके बावजूद वर्तमान प्रकरण में उन्हें जांच से बाहर रखा जाना वन विभाग की मंशा पर सवाल खड़ा कर रहा है।
पीसीसीएफ और हॉफ को जब मिला संज्ञान
यह मामला जब प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी) शुभरंजन सेन और हॉफ वीएन अंबाड़े के संज्ञान में आया, तभी जांच की प्रक्रिया तेज हुई और कार्यवाही शुरू हुई। इससे पहले स्थानीय अधिकारी इस पूरे घटनाक्रम को छुपाने की कोशिश कर रहे थे।
ग्रामीणों में आक्रोश और सवालों की बौछार
जिन ग्रामीणों को आरोपित किया गया है, वे वन विभाग की कार्यवाही से नाखुश हैं। उनका आरोप है कि कुछ कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाया गया, जबकि असली दोषियों को बचाया जा रहा है। उन्होंने जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा कि बाघ के शव को जलाना कोई सामान्य घटना नहीं थी। इसके लिए वाहनों की मदद, मानव संसाधन और विभागीय जानकारी जरूरी थी।
बाघ संरक्षण की दिशा में विभागीय शिथिलता
यह घटना बाघों के संरक्षण के प्रति वन विभाग की गंभीर शिथिलता को उजागर करती है। बाघ की मौत अपने आप में एक दुर्भाग्यपूर्ण और गंभीर विषय है, लेकिन उससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि मौत को छुपाने के लिए साक्ष्य मिटाए गए, और जिम्मेदार अफसरों को बचाया गया। इससे न केवल विभाग की साख पर आंच आती है, बल्कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को और बढ़ावा मिलता है।
