गणेश पाण्डेय, आईबीएन। लोकसभा सत्र के दौरान गुरुवार को सतना से सांसद गणेश सिंह ने केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियमावली, 1964 के नियम 20 में संशोधन की मांग को लेकर संसद में एक गंभीर और सशक्त हस्तक्षेप किया। उन्होंने नियम 377 के तहत लोकहित के एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय को उठाते हुए केंद्र सरकार से अनुरोध किया कि इस नियम में आवश्यक परिवर्तन किए जाएं, जिससे सांसदों एवं विधायकों के संवैधानिक अधिकारों और विशेषाधिकारों की प्रभावी रक्षा सुनिश्चित की जा सके।
सांसद गणेश सिंह ने सदन के पटल पर स्पष्ट किया कि वर्तमान नियम 20 में यह उल्लेख है कि कोई भी सरकारी कर्मचारी अपने निजी हितों के लिए किसी सांसद या विधायक से सिफारिश, अनुशंसा या राजनीतिक प्रभाव की अपेक्षा नहीं कर सकता। उन्होंने इस प्रावधान को न केवल अप्रासंगिक, बल्कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के संवैधानिक कर्तव्यों के विरुद्ध करार दिया।
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि सांसद और विधायक देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के आधार स्तंभ हैं। जनता उन्हें अपने प्रतिनिधि के रूप में चुनती है और उनके माध्यम से अपनी समस्याओं एवं मांगों को सरकार तक पहुंचाना चाहती है। ऐसे में यह नियम न केवल सांसदों के अधिकारों का हनन करता है, बल्कि उनके संवैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन में भी बाधा उत्पन्न करता है।
गणेश सिंह ने मांग की कि नियम 20 में संशोधन कर यह स्पष्ट किया जाए कि सांसदों और विधायकों की भूमिका केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी हुई है। ऐसे में उनके जनहितकारी कार्यों में किसी भी प्रकार की प्रशासनिक या कानूनी रुकावट नहीं आनी चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि सरकार देशभर के उन मामलों का विवरण सार्वजनिक करे जिनमें इस नियम का उपयोग कर किसी प्रकार की कार्रवाई की गई हो। इससे इस नियम की वास्तविक प्रवृत्ति, व्यवहार में आई विसंगतियाँ तथा दुरुपयोग की आशंकाओं का समुचित मूल्यांकन किया जा सकेगा।
उन्होंने उदाहरण स्वरूप यह भी कहा कि जिस प्रकार विभिन्न संसदीय समितियों और आयोगों में सांसदों को विधिसम्मत भागीदारी का अधिकार प्राप्त है, उसी तरह उनके प्रतिनिधित्व के अधिकारों और जनसंपर्क कार्यों को भी विधिक संरक्षण मिलना चाहिए।
सांसद सिंह की इस मांग को न केवल लोकतंत्र के मूल स्वरूप की रक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है, बल्कि यह प्रश्न भी उठ रहा है कि क्या वर्तमान नियम 20, जिस रूप में है, वह आज के सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक परिप्रेक्ष्य में न्यायसंगत है?
उन्होंने कहा कि नियमों का उद्देश्य शासन व्यवस्था को सुचारू, पारदर्शी और जवाबदेह बनाना होता है, लेकिन यदि कोई नियम जनप्रतिनिधियों की भूमिका को सीमित करता है या उन्हें जनता से दूरी बनाने को विवश करता है, तो उसका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक हो जाता है।
सांसद गणेश सिंह की यह पहल लोक प्रतिनिधियों की गरिमा, जिम्मेदारियों और संवैधानिक भूमिका की पुनर्परिभाषा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अब यह देखना शेष है कि सरकार इस मांग को किस गंभीरता से लेती है और नियम 20 के स्वरूप में किसी परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ती है या नहीं।
