स्टेट टाइगर टास्क फोर्स करेगी पूरे मामले की जांच, उड़न दस्ते की पकड़ से शिकारी छूटा
गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश के दक्षिण बालाघाट वन मंडल के लालबर्रा परिक्षेत्र में बाघिन की संदिग्ध मौत ने वन विभाग में हलचल मचा दी है। प्रारंभिक जांच में गंभीर लापरवाही सामने आने के बाद मामले की जांच कर रहे उपवन मंडल अधिकारी (एसडीओ) बीआर सिरसाम को निलंबित करने की सिफारिश कर दी गई है। सूत्रों के अनुसार निलंबन आदेश गुरुवार शाम तक जारी किए जा सकते हैं। हालांकि इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक जवाबदेही वनमंडल अधिकारी (डीएफओ) अधर गुप्ता की मानी जा रही है, लेकिन उन्हें बचाने के प्रयास तेज हो गए हैं।
राज्य वन्यप्राणी प्रमुख एल. कृष्णमूर्ति ने जानकारी दी कि अब मामले की जांच स्टेट टाइगर टास्क फोर्स (STTF) करेगी और यदि जांच में डीएफओ दोषी पाए गए तो उन पर भी सख्त कार्रवाई की जाएगी। वहीं बालाघाट जिले के चारों विधायकों ने डीएफओ अधर गुप्ता को तत्काल पद से हटाकर दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है।
कैसे फंसा एसडीओ, कैसे बच रहा डीएफओ?
सूत्रों के अनुसार बाघिन की मौत की जांच के बीच सीएफ कार्यालय की उड़नदस्ता टीम ने एक संदिग्ध शिकारी को पकड़ा था और एसडीओ सिरसाम की टीम को सौंपा गया। लेकिन पूछताछ के दौरान शिकारी टीम की हिरासत से फरार हो गया। इस बड़ी चूक के बाद सीएफ गौरव चौधरी ने एसडीओ को निलंबित करने की सिफारिश मुख्यालय को भेजी, जिसे शासन तक पहुंचा दिया गया।
वहीं डीएफओ अधर गुप्ता की भूमिका जांच में शून्य रही है। न वे कार्यालय में उपस्थित हैं और न ही फील्ड में सक्रिय। फील्ड स्टाफ के अनुसार न ही उन्होंने उच्चाधिकारियों को घटना की समय पर सूचना दी, न ही एनटीसीए के SOP का पालन किया।
डीएफओ की लापरवाही क्यों है गंभीर?
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के मानकों के अनुसार किसी भी शेड्यूल-1 श्रेणी के वन्यप्राणी की मृत्यु के बाद विशेष प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। इसमें पोस्टमार्टम, आवश्यक नमूनों का संग्रहण, उच्च अधिकारियों की उपस्थिति, और वैज्ञानिक पद्धति से अंतिम संस्कार शामिल है। लेकिन डीएफओ गुप्ता ने न तो मुख्य वन संरक्षक (CCF) को सूचना दी, न ही टीम गठित की।
वन बल प्रमुख वीएन अंबाड़े और पीसीसीएफ (वन्यप्राणी) ने भी माना है कि बाघिन की मौत में बहुस्तरीय लापरवाही हुई है।
अजय दुबे ने उठाई आवाज
प्रख्यात वन्यजीव प्रेमी अजय दुबे ने एनटीसीए और वन बल प्रमुख को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि बालाघाट साउथ के सोनवानी क्षेत्र में बाघों की भारी उपस्थिति के बावजूद वन अमला निष्क्रिय है। डीएफओ का कार्यालय से लंबे समय तक अनुपस्थित रहना, फील्ड भ्रमण न करना और ऑनलाईन टीपी के मामलों में लंबित फाइलों की संख्या इस लापरवाही को दर्शाती है।
क्या कहता है स्थानीय जनमानस
स्थानीय लोगों का कहना है कि बाघ के शिकार की सूचना 27 जुलाई को ही फैल चुकी थी, लेकिन इसके बावजूद न तो कोई सुरक्षात्मक कार्रवाई हुई और न ही वन अमले ने सतर्कता दिखाई। इससे यह आशंका प्रबल होती है कि विभागीय मिलीभगत से अपराधियों को संरक्षण मिला।
आगे की कार्रवाई
अब जबकि मामला STTF को सौंपा गया है, पूरे प्रदेश की निगाहें इस जांच पर टिकी हैं। यह परीक्षण भी होगा कि क्या मध्यप्रदेश सरकार वाकई में बाघ संरक्षण को गंभीरता से ले रही है या फिर अधिकारियों की ढिलाई को अनदेखा कर बाघों की सुरक्षा खतरे में डाली जा रही है।
