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जांच समिति की रिपोर्ट में कहा- “गवाहों ने पुष्टि नहीं की, आरोप साबित नहीं हुए”

गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश की बालाघाट विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक अनुभा मुंजारे को वन विभाग की डीएफओ नेहा श्रीवास्तव से “2-3 पेटी रकम” मांगने के कथित मामले में क्लीन चिट मिल गई है।
राज्य शासन को सौंपी गई दो सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि किसी भी गवाह ने नहीं की है।

क्या था मामला

डीएफओ नेहा श्रीवास्तव ने 18 अगस्त को प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ), भोपाल को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि

“16 अगस्त को विधायक अनुभा मुंजारे ने बालाघाट के फॉरेस्ट रेस्ट हाउस में मुलाकात के दौरान 2-3 पेटी रकम की मांग की। रकम नहीं देने पर विधायक ने अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया।”

उन्होंने यह भी बताया था कि मुलाकात सार्वजनिक अवकाश के दिन हुई थी और इसमें उनके निजी स्टाफ व सुरक्षा कर्मी मौजूद थे।

सरकार ने बनाई जांच समिति

इस शिकायत के बाद राज्य शासन ने 3 सितंबर को इस प्रकरण की जांच के लिए दो सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति गठित की।
इसमें शामिल थीं —

  • कमलिका मोहंता, अपर प्रधान मुख्य वनसंरक्षक (प्रशासन–2), वन मुख्यालय भोपाल
  • वासु कनोजिया, वन संरक्षक, बैतूल वन वृत्त

समिति ने संबंधित पक्षों से बयान दर्ज किए और रिपोर्ट तैयार कर शासन को सौंपी।

रिपोर्ट में क्या कहा गया

जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि

“डीएफओ नेहा श्रीवास्तव और विधायक अनुभा मुंजारे की मुलाकात बंद कमरे में हुई थी, इसलिए कोई प्रत्यक्ष गवाह नहीं था।”
“किसी भी उपस्थित व्यक्ति ने रकम मांगने या अनुचित व्यवहार की पुष्टि नहीं की।”

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि
विधायक को नोटिस जारी कर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने लिखित जवाब नहीं दिया

डीएफओ पर भी उठे सवाल

विभागीय सूत्रों के अनुसार, डीएफओ नेहा श्रीवास्तव के खिलाफ यह आरोप भी लगाया गया कि उन्होंने यह शिकायत अपने पति डीएफओ अधर गुप्ता से जुड़ी विभागीय कार्रवाई को प्रभावित करने के उद्देश्य से की थी।
जांच रिपोर्ट में इस पहलू को भी दर्ज किया गया है कि “मामले में व्यक्तिगत मतभेद या विभागीय तनाव की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।”

क्लीन चिट के बाद सियासी हलचल थमी

कांग्रेस विधायक अनुभा मुंजारे को क्लीन चिट मिलने के बाद बालाघाट जिले की सियासत में चल रही हलचल कुछ शांत हुई है।
हालांकि विभागीय सूत्रों का कहना है कि शासन स्तर पर इस पूरे विवाद का रिकॉर्ड बंद कर दिया गया है, पर डीएफओ ट्रांसफर और अफसर-राजनीति के रिश्तों पर सवाल अब भी कायम हैं। जांच समिति ने निष्कर्ष में कहा है कि “आरोपों के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण या साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।” इसलिए विधायक पर लगाए गए आर्थिक मांग के आरोप असत्य और अप्रमाणित पाए गए।