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चार साल बाद चीता प्रोजेक्ट के सामने उपलब्धियों के साथ जवाबदेही का सवाल

गणेश पाण्डेय, भोपाल। 17 सितंबर को भारत के चीता प्रोजेक्ट के चार साल पूरे हो रहे हैं। 2022 में नामीबिया से लाए गए आठ चीतों से शुरू हुआ यह अभियान अब कुनो से आगे बढ़कर मध्यप्रदेश के कई जिलों तक पहुंच चुका है। देश में चीतों की संख्या बढ़ी है, भारतीय जंगल में शावकों का जन्म हुआ है और दूसरी पीढ़ी भी सामने आ चुकी है। लेकिन चार साल पूरे होने पर उपलब्धियों के साथ यह सवाल भी जरूरी है कि इस परियोजना पर अब तक कितना खर्च हुआ, कितनी मौतें हुईं और कितने चीते वास्तव में स्वतंत्र रूप से जंगल में जीवन बिता रहे हैं।

संख्या बढ़ी, लेकिन आत्मनिर्भर आबादी का लक्ष्य अभी बाकी

पहले चरण में सितंबर 2022 में नामीबिया से आठ और फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते भारत लाए गए। इसके बाद 2026 में बोत्सवाना से भी चीते लाए गए। मार्च 2026 में ज्वाला के पांच शावकों के जन्म के बाद भारत में चीतों की संख्या 53 बताई गई, जिनमें भारत में जन्मे 33 शावक शामिल हैं।

यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल संख्या बढ़ना ही परियोजना की सफलता का अंतिम पैमाना नहीं हो सकता। असली सवाल यह है कि कितने चीते खुले जंगल में अपना स्थायी क्षेत्र बना चुके हैं, कितने नियमित रूप से शिकार कर रहे हैं और कितने बिना लगातार मानवीय हस्तक्षेप के जीवित रह सकते हैं।

मौतों का आंकड़ा भी सामने रखना होगा

परियोजना के दौरान वयस्क चीतों और शावकों की मौतें भी हुई हैं। संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार 2023 में छह वयस्क और तीन शावक, 2024 में दो वयस्क और चार शावक तथा 2025 में एक वयस्क और पांच शावकों की मौत दर्ज की गई।

इसलिए परियोजना की समीक्षा में जन्म और मौत दोनों आंकड़े समान रूप से सार्वजनिक किए जाने चाहिए। केवल सफल जन्मों का उल्लेख करने से जंगली आबादी की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं होती।

91.65 करोड़ का अनुमान, खर्च पर उठे सवाल

परियोजना के पहले पांच वर्षों के लिए 91.65 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत तय की गई थी। वहीं मध्यप्रदेश में हुए सरकारी ऑडिट में 2021-22 से जनवरी 2024 तक परियोजना पर 44.14 करोड़ रुपये खर्च होने का उल्लेख किया गया। ऑडिट में कहा गया कि यह खर्च स्वीकृत प्रबंधन योजना के अनुरूप नहीं था। खर्च, निर्माण कार्य, दस्तावेजीकरण और केंद्र-राज्य समन्वय को लेकर भी आपत्तियां दर्ज की गई थीं।

ऑडिट में कुछ निर्माण कार्यों में मशीनों के इस्तेमाल, श्रम भुगतान और सामग्री की मात्रा से जुड़ी अनियमितताओं का भी उल्लेख किया गया था। विभाग ने इन बिंदुओं पर स्पष्टीकरण और सुधारात्मक कार्रवाई का आश्वासन दिया था। अब जरूरत इस बात की है कि इन आपत्तियों का बिंदुवार निपटारा सार्वजनिक किया जाए।

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कुनो से बाहर बढ़ा दायरा, बढ़ी निगरानी की चुनौती

हालिया रिपोर्टों के अनुसार करीब 30 कॉलर लगे चीतों की 24 घंटे निगरानी की जा रही है। इनमें कुछ चीते खुले क्षेत्र में विचरण कर रहे हैं, जबकि कुछ बड़े बाड़बंद प्राकृतिक वन क्षेत्रों में रखे गए हैं। चीतों की आवाजाही कुनो से बाहर छह जिलों तक पहुंच चुकी है।

यह प्राकृतिक क्षेत्र विस्तार का संकेत हो सकता है, लेकिन इससे वन विभाग की सुरक्षा और मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन क्षमता की भी परीक्षा होगी। यदि आबादी 60 से 70 या उससे अधिक होती है, तो क्या मौजूदा निगरानी मॉडल उतना ही प्रभावी और आर्थिक रूप से टिकाऊ रहेगा?

गांधीसागर के बाद विस्तार की असली परीक्षा

गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में भी चीता पुनर्वास शुरू हो चुका है। भविष्य में अन्य संभावित क्षेत्रों को जोड़ने की योजना है। सरकार का लक्ष्य एक ऐसी मेटापॉपुलेशन तैयार करना है, जो लंबे समय में स्वयं को बनाए रख सके। परियोजना के आधिकारिक लक्ष्य के अनुसार 2032 तक 17 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 60 से 70 चीतों की आत्मनिर्भर आबादी विकसित करने की योजना है।

लेकिन नए क्षेत्रों में विस्तार से पहले कुछ सवालों के जवाब जरूरी हैं। क्या वहां पर्याप्त शिकार आधार उपलब्ध है? क्या ग्रामीण क्षेत्रों से सुरक्षित दूरी सुनिश्चित है? क्या चीतों के बाहर निकलने की स्थिति में ग्रामीणों की सुरक्षा, मुआवजा और त्वरित प्रतिक्रिया की व्यवस्था तैयार है?

अब सार्वजनिक होना चाहिए पूरा हिसाब

चार साल पूरे होने पर सरकार को परियोजना की एक विस्तृत सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करनी चाहिए। इसमें आवंटित और खर्च की गई राशि, खर्च का मदवार विवरण, चीतों की मौत, जन्म, वर्तमान संख्या, खुले जंगल में रहने वाले चीतों और मानवीय निगरानी पर निर्भर चीतों की जानकारी शामिल होनी चाहिए।

चीता प्रोजेक्ट केवल वन्यजीव संरक्षण का अभियान नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन और वैज्ञानिक प्रबंधन से जुड़ी राष्ट्रीय परियोजना है। इसलिए इसकी सफलता का आकलन संख्या और प्रचार से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक परिणाम, स्वतंत्र जंगली आबादी, वित्तीय पारदर्शिता और दीर्घकालीन आत्मनिर्भरता के आधार पर होना चाहिए।