वन भवन भोपाल मप्र

वन विभाग में निलंबन और बहाली की अलग-अलग कसौटियों पर सवाल

गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश वन विभाग में विभागीय कार्रवाई की समानता और पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। नर्मदापुरम सामान्य वनमंडल की सिवनी रेंज में काले हिरण शिकार मामले में निलंबित रेंजर समेत करीब आधा दर्जन कर्मचारी महीनों से निलंबित हैं, जबकि सतपुड़ा टाइगर रिजर्व की तवा बफर रेंज में वित्तीय अनियमितता के आरोपों में निलंबित रेंजर और कर्मचारियों को लगभग एक महीने में बहाल कर दिया गया। दोनों मामलों में कर्मचारियों की लापरवाही और विभागीय जिम्मेदारी का सवाल जुड़ा है, लेकिन निलंबन और बहाली के फैसलों में इतना अंतर अब विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

दो मामलों में कार्रवाई का अंतर

सिवनी रेंज के कर्मचारियों को दिसंबर 2025 में निलंबित किया गया था। अप्रैल में डीएफओ नर्मदापुरम ने उन्हें बहाल कर अलग-अलग रेंजों में पदस्थ किया, लेकिन कुछ समय बाद उन्हें फिर निलंबित कर दिया गया। वर्तमान में कर्मचारी 50 प्रतिशत जीवन निर्वाह भत्ते पर हैं।

इसके विपरीत तवा बफर रेंज में वित्तीय अनियमितता के मामले में रेंजर समेत करीब आधा दर्जन कर्मचारियों को निलंबित कर आरोप पत्र दिए गए और वित्तीय नुकसान की वसूली की कार्रवाई के लिए प्रक्रिया शुरू की गई। इसके बावजूद उन्हें लगभग एक महीने के भीतर बहाल कर विभिन्न रेंजों में काम पर भेज दिया गया।

सवाल यह है कि एक मामले में जांच लंबित रहते बहाली संभव है तो दूसरे मामले में कर्मचारियों को लगातार निलंबित रखने का आधार क्या है?

सिवनी रेंज में पहले बहाली, फिर दोबारा निलंबन

नर्मदापुरम के सिवनीमालवा वन परिक्षेत्र में काले हिरण शिकार मामले में रेंजर सहित छह वनकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की गई थी। सार्वजनिक रिपोर्टों में भी कर्मचारियों के निलंबन और वन्यजीव संरक्षण में लापरवाही के आरोपों का उल्लेख हुआ था।

कर्मचारियों को अप्रैल में बहाल कर अलग-अलग रेंजों में भेजे जाने के बाद दोबारा निलंबित कर दिया गया। इस पूरी प्रक्रिया ने विभागीय आदेशों की निरंतरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि जांच पूरी नहीं हुई थी तो बहाली किस आधार पर हुई और यदि बाद में कोई नया तथ्य सामने आया तो पुनः निलंबन का स्पष्ट कारण क्या था?

तवा बफर में आरोप पत्र के बाद भी जल्द बहाली

सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के तवा बफर रेंज में वित्तीय अनियमितता के मामले में आरोप पत्र जारी किए गए थे। विभागीय स्तर पर वित्तीय नुकसान की वसूली और जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई प्रस्तावित थी। इसके बावजूद संबंधित कर्मचारियों को करीब एक महीने में बहाल कर दिया गया।

वित्तीय अनियमितता का मामला सरकारी धन और विभागीय रिकॉर्ड से जुड़ा होता है। ऐसे मामले में जांच पूरी होने से पहले बहाली की अनुमति किन परिस्थितियों में दी गई, यह विभाग को स्पष्ट करना चाहिए। यदि कर्मचारी सेवा में वापस भेजे जा सकते थे तो सिवनी रेंज के कर्मचारियों के मामले में अलग नीति क्यों अपनाई गई?

निलंबित कर्मचारियों की आर्थिक परेशानी

सिवनी रेंज के कर्मचारियों का कहना है कि वे पिछले दिसंबर से निलंबन की कार्रवाई झेल रहे हैं। 50 प्रतिशत जीवन निर्वाह भत्ते में परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है। लंबे समय तक निलंबन और जांच लंबित रहने से उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो रही है।

निलंबन का उद्देश्य जांच को प्रभावित होने से रोकना है, लेकिन जांच अनिश्चितकाल तक लंबित रखना भी प्रशासनिक रूप से उचित नहीं माना जा सकता। मध्यप्रदेश वन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर विभागीय आदेशों और कानूनी जानकारी के लिए अलग व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं, इसलिए कर्मचारियों को निलंबन और जांच की स्थिति के संबंध में स्पष्ट प्रशासनिक जानकारी मिलना जरूरी है।

एक ही रैंक के अधिकारी, फिर इतना अंतर क्यों?

निलंबित कर्मचारियों का कहना है कि दोनों मामलों में निलंबन और बहाली से जुड़े अधिकारी समान रैंक के आईएफएस अधिकारी हैं। उनका सवाल है कि जब विभागीय कार्रवाई एक ही प्रशासनिक ढांचे के अंतर्गत हो रही है तो फैसलों में इतना अंतर क्यों है।

अलग-अलग मामलों की गंभीरता और साक्ष्यों के आधार पर अलग कार्रवाई संभव है, लेकिन उसके पीछे स्पष्ट कारण होना चाहिए। यदि किसी कर्मचारी को निलंबित रखना जरूरी है तो जांच की प्रगति और निलंबन जारी रखने का आधार बताया जाना चाहिए। वहीं बहाली की स्थिति में भी विभागीय हित, जांच की स्थिति और प्रशासनिक कारण स्पष्ट होने चाहिए।

विभागीय कार्रवाई में पारदर्शिता जरूरी

वन्यजीव संरक्षण में लापरवाही और वित्तीय अनियमितता दोनों गंभीर विषय हैं। किसी भी मामले में दोष सिद्ध होने से पहले कर्मचारी को दोषी नहीं माना जा सकता, लेकिन विभाग को जांच समयबद्ध तरीके से पूरी करनी चाहिए। इसी तरह, यदि आरोपों के बीच बहाली की जाती है तो उसका आधार भी स्पष्ट होना चाहिए।

सिवनी रेंज और तवा बफर के मामलों ने वन विभाग के सामने समान नियमों और प्रशासनिक निष्पक्षता का सवाल खड़ा कर दिया है। विभाग को यह बताना होगा कि दोनों मामलों में निलंबन की अवधि, बहाली और जांच की प्रक्रिया अलग क्यों रही। जब तक इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं मिलता, कार्रवाई की निष्पक्षता पर उठ रहे सवाल बने रहेंगे।