ईसी घोटाले पर सिया चेयरमैन और वरिष्ठ अधिकारियों की चुप्पी सवालों के घेरे में
गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश में पर्यावरण स्वीकृति (Environment Clearance – EC) की प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितता और फर्जीवाड़े का मामला उजागर हुआ है। सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी आज़ाद सिंह डबास ने केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को पत्र लिखकर मांग की है कि राज्य में बिना विधिवत बैठक और स्वीकृति के 450 परियोजनाओं को जारी की गई ईसी की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।
डबास ने अपने पत्र में गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि 23 मई 2025 को राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरण (SIA) द्वारा इन सभी प्रकरणों को डीम्ड मंजूरी दे दी गई, जबकि उस दिन सिया की मेंबर सेक्रेटरी उमा महेश्वरी मेडिकल अवकाश पर थीं। उनकी अनुपस्थिति में अस्थायी रूप से नियुक्त प्रभारी श्रीमन शुक्ला—जो एप्को के कार्यकारी निदेशक भी हैं—ने यह कार्यवाही की।
डबास ने आरोप लगाया कि यह पूरी प्रक्रिया पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन अधिसूचना 2006 के पैरा-8 की कंडिका 3 का गलत उपयोग करके की गई है, जबकि नियमानुसार सिया की बैठक में चर्चा और अनुमोदन के बाद ही कोई पर्यावरणीय मंजूरी दी जा सकती है।
450 में से 200 से अधिक प्रकरण खनिज परियोजनाओं से जुड़े
डबास ने अपने पत्र में उल्लेख किया कि इन 450 में से 200 से अधिक परियोजनाएं खनिज विभाग से जुड़ी हैं, जो अपने आप में एक बड़ा संकेत है कि यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक सुनियोजित घोटाले का रूप ले चुका है।
सिया चेयरमैन ने भी रिपोर्ट भेजी, बताया अवैध
इस मामले की पुष्टि खुद सिया के चेयरमैन शिव नारायण सिंह चौहान ने भी की है। उन्होंने 26 मई 2025 को केंद्रीय सचिव को एक विस्तृत रिपोर्ट भेजी है, जिसमें इन सभी मंजूरियों को गैरकानूनी बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 17 मार्च से 15 मई के बीच चेयरमैन द्वारा 10 बार मेंबर सेक्रेटरी को बैठक बुलाने की नोटशीट भेजी गई, लेकिन जानबूझकर कोई बैठक नहीं बुलाई गई। चौहान ने मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और पर्यावरण सचिव को भी 22 पत्र लिखे, परंतु कोई कार्यवाही नहीं हुई।
राजनीतिक नियुक्तियों पर भी उठे सवाल
डबास ने आरोप लगाया है कि सिया में चेयरमेन और सदस्य पदों पर नियुक्ति पूरी तरह से राजनीतिक सुविधा के अनुसार की जाती है। न तो इन पदाधिकारियों की पात्रता की सही जांच होती है और न ही केंद्र सरकार द्वारा कोई स्क्रूटनी की जाती है। यही कारण है कि इतने बड़े पैमाने पर पर्यावरण मंजूरियों में घोटाला संभव हो सका।
क्या है कानूनी प्रावधान?
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के अनुसार, 250 हेक्टेयर से अधिक की परियोजनाओं के लिए पर्यावरण मंजूरी केंद्र सरकार देती है, जबकि इससे कम क्षेत्र की परियोजनाओं की जिम्मेदारी राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरण (SIA) की होती है। इस व्यवस्था में बैठक बुलाकर, सदस्यों की सहमति से ही मंजूरी दी जानी चाहिए।
बिना बैठक के जारी हुई 450 ईसी—घोर लापरवाही या संगठित भ्रष्टाचार?
इस मामले में गंभीर सवाल उठते हैं कि जब सिया की बैठकें नहीं हुईं, और मेंबर सेक्रेटरी छुट्टी पर थीं, तो कैसे और किसके दबाव में इतनी बड़ी संख्या में पर्यावरण स्वीकृतियां दी गईं? क्या यह अधिकारियों का प्रशासनिक अतिरेक था या फिर उद्योगपतियों और खनन कारोबारियों को लाभ पहुंचाने की एक सोची-समझी रणनीति?
डबास की मांग है कि इस पूरे प्रकरण की जांच किसी स्वतंत्र और उच्च स्तरीय एजेंसी से कराई जाए ताकि दोषियों की पहचान हो सके और पर्यावरणीय पारदर्शिता को पुनः स्थापित किया जा सके।
