विधि सलाहकार का पद मंजूर, सर्किल स्तर पर एडीपीओ की होगी पदस्थापना
गणेश पाण्डेय, भोपाल। वन विभाग में सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट और जिला अदालतों तक करीब 20 हजार से अधिक मामले लंबित पड़े हैं। इनमें सेवा संबंधी विवाद से लेकर वन अपराधों तक के प्रकरण शामिल हैं। इन मामलों के समय पर निराकरण और अदालतों में विभाग का पक्ष मजबूती से रखने के लिए अब वन विभाग लीगल सेल गठित करने की तैयारी कर रहा है। इस संबंध में वन बल प्रमुख वी.एन. अम्बाड़े ने संकेत दिए हैं और बताया कि प्रस्ताव पर अपर मुख्य सचिव वन अशोक वर्णवाल से चर्चा भी हो चुकी है।
लीगल सेल की संरचना
वन बल प्रमुख के अनुसार, लीगल सेल पीसीसीएफ उत्पादन के अधीन कार्य करेगा और वन भवन में इसका अलग कक्ष होगा। संरचना के तहत मुख्यालय में एक विधि सलाहकार की नियुक्ति की जाएगी, जिसका पद पहले से स्वीकृत है। यह अधिकारी विधि विभाग से प्रतिनियुक्ति पर लाया जाएगा। इसके अलावा, सर्किल स्तर पर एडीपीओ (सहायक जिला अभियोजन अधिकारी) की पदस्थापना की जाएगी, जबकि वन मंडलों में शासकीय अधिवक्ताओं की सेवाएं ली जाएंगी। यदि विधि विभाग से प्रतिनियुक्ति पर अधिकारी उपलब्ध नहीं होते हैं, तो आउटसोर्सिंग के माध्यम से पद भरे जाएंगे।
लंबित मामलों की प्रकृति
विभाग के सामने लंबित मामलों में कैडर आवंटन में गड़बड़ी, पदोन्नति, चयन वेतनमान, नियमितीकरण, वेतन विसंगतियां और वन अपराध प्रमुख हैं। खासकर वन अपराधों से जुड़े मामलों में प्रायः देखा गया है कि विभाग द्वारा नियुक्त अधिकारी अदालतों में ठोस साक्ष्य और तथ्य प्रस्तुत नहीं कर पाते, जिसके कारण आरोपी आसानी से जमानत पा लेते हैं या बरी हो जाते हैं।
लापरवाही से गंभीर परिणाम
कई मामलों में विभागीय लापरवाही ने स्थिति को गंभीर बना दिया। उदाहरणस्वरूप, बालाघाट का एक मामला चर्चा में है, जिसमें कोलकाता की कल्पतरु संस्था ने 1 करोड़ 20 हजार रुपये के भुगतान को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दायर की। इस मामले में ओआईसी बनाई गई डीएफओ नेहा श्रीवास्तव एक भी पेशी पर कोर्ट में उपस्थित नहीं हुईं। नतीजतन, कोलकाता हाई कोर्ट ने डीएफओ और सीएफ कार्यालय बालाघाट को सील कर दिया। यह कार्यालय पिछले दो महीने से बंद है। अब सीएफ गौरव चौधरी ने इस कुर्की आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर करने की अनुमति ली है।
इसी प्रकार, पिछले महीने एक आरा मशीन संचालक ने एसीएस अशोक वर्णवाल और पीसीसीएफ मनोज अग्रवाल को नामजद पार्टी बनाते हुए केस दायर किया है। इससे साफ है कि शीर्ष अधिकारियों तक को भी अदालती विवादों में उलझना पड़ रहा है।
लीगल सेल की आवश्यकता
इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विभाग के पास एक संगठित विधिक ढांचा न होने से न केवल सरकारी हित प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि वित्तीय और प्रशासनिक संकट भी खड़ा हो रहा है। ऐसे में लीगल सेल का गठन अदालतों में विभाग का पक्ष मजबूती से रखने और मामलों का शीघ्र निपटारा करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

