बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व ईएसजेड में वाटर पार्क निर्माण का मामला गरमाया
गणेश पाण्डेय, भोपाल। वन विभाग की कार्यशैली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। दरअसल, अपर मुख्य सचिव (वन) अशोक वर्णवाल ने हाल ही में टाइम लिमिट बैठक के दौरान उस अफसर को चार्जशीट जारी करने के निर्देश दिए, जिसने चार साल पहले ही भारतीय वन सेवा को अलविदा कह दिया था। यह मामला बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के ईको सेंसिटिव जोन (ईएसजेड) में बने वाटर पार्क से जुड़ा है।
चार्जशीट का आदेश 2015 बैच के पूर्व आईएफएस अधिकारी सिद्धार्थ गुप्ता के खिलाफ दिया गया है। गुप्ता 2019 से 2020 तक बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के उप संचालक रहे थे। वर्तमान में वे भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) के 2021 बैच के अधिकारी हैं। आरोप है कि गुप्ता ने अपने कार्यकाल के दौरान धमोखर बफर क्षेत्र से सटे ग्राम महामन में निजी भूमि पर वाटर पार्क निर्माण की अनुमति दी थी।
एसीएस का निर्देश और पीसीसीएफ की चुप्पी
सूत्रों के मुताबिक, टाइम लिमिट बैठक में एसीएस वर्णवाल ने बिना पूरी हकीकत समझे ही तत्कालीन उप संचालक को दोषी मानते हुए चार्जशीट जारी करने का फरमान सुना दिया। बैठक में मौजूद पीसीसीएफ स्तर के अफसरों ने भी यह स्पष्ट करने की कोशिश नहीं की कि उस समय उप संचालक ने यह अनुमति तत्कालीन एपीसीसीएफ (भू-प्रबंध) सुनील अग्रवाल के लिखित निर्देश पर दी थी।
एपीसीसीएफ के निर्देश पर मिली थी अनुमति
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि तत्कालीन एपीसीसीएफ सुनील अग्रवाल ने उप संचालक को लिखित रूप से निर्देशित किया था कि वाटर पार्क निर्माण से न तो वन्यजीवों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा और न ही वृक्षों का नुकसान होगा। उन्होंने साफ कहा था कि यह कार्य ईएसजेड अधिसूचना के तहत प्रतिबंधित गतिविधियों में नहीं आता। साथ ही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से पर्यावरणीय स्वीकृति की आवश्यकता है या नहीं, यह जांचने की बात भी पत्र में कही गई थी।

सवालों के घेरे में प्रक्रिया
अब जब वाटर पार्क बन चुका है और शिकायतें सामने आई हैं, तो पूरा मामला फिर से उछल पड़ा है। पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि दोषी कौन है – वह उप संचालक जिसने उच्च अधिकारी के आदेश का पालन किया, या वह एपीसीसीएफ जिसने लिखित रूप से अनुमति की राह आसान की?
वन महकमे के अफसरों में इस फैसले को लेकर कानाफूसी तेज है। आईएफएस बिरादरी का बड़ा तबका मानता है कि सेवानिवृत्त या सेवा बदल चुके अधिकारी को चार्जशीट जारी करने का निर्देश न केवल बेतुका है, बल्कि इससे विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
