वन विभाग को लोकायुक्त ने भेजा लैटर

डीजी लोकायुक्त ने एसीएस वन को भेजा पत्र, अफसरों पर आरोपी को बचाने का आरोप

गणेश पाण्डेय, भोपाल। बहुचर्चित 12 लाख रुपए रिश्वत मामले में सीहोर वन मंडल में पदस्थ एसडीओ एल्विन बर्मन के खिलाफ अब विशेष न्यायालय में मुकदमा चलाने की तैयारी तेज हो गई है। विशेष पुलिस स्थापना लोकायुक्त ने आरोपी एसडीओ के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति के लिए राज्य शासन को पत्र भेजा है। लेकिन एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी स्वीकृति नहीं मिली है, जिससे मामला फंसता नजर आ रहा है।

डीजी लोकायुक्त ने भेजा पत्र

वन विभाग को लोकायुक्त का लैटर

विशेष पुलिस स्थापना लोकायुक्त के महानिदेशक योगेश देशमुख ने 2 मई 2025 को अपर मुख्य सचिव (एसीएस) वन मनोज वर्णवाल को पत्र लिखकर बर्मन के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति मांगी है। लेकिन विभाग अब तक अनुमति नहीं दे पाया है। सूत्रों के अनुसार, वन विभाग के कुछ शीर्ष अधिकारी बर्मन को बचाने का प्रयास कर रहे हैं और यही वजह है कि अभियोजन की प्रक्रिया में देरी की जा रही है।

5 साल की जांच के बाद पुष्टि
यह मामला वर्ष 2019 का है, जब एल्विन बर्मन इंदौर में एसडीओ पद पर पदस्थ थे। पांच वर्षों की लंबी जांच के बाद लोकायुक्त ने पाया कि उन्होंने स्कूल संचालक से 12 लाख रुपए की रिश्वत मांगी थी। जांच में यह प्रथम दृष्टया प्रमाणित हुआ कि तत्कालीन एसडीओ एल्विन बर्मन और अन्य ने भ्रष्ट आचरण किया।

डीजी देशमुख ने पत्र में स्पष्ट लिखा है कि आरोपी बर्मन को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधित 2018) की धारा 7 और आईपीसी की धारा 120-बी के अंतर्गत अभियोजन चलाने हेतु अभियोजन स्वीकृति आवश्यक है। इसीलिए म.प्र. शासन से अनुरोध किया गया है कि शीघ्र आदेश जारी कर लोकायुक्त संगठन को भेजें।

क्या है पूरा मामला
इंदौर-चोरल रेंज के तत्कालीन एसडीओ एल्विन बर्मन और डिप्टी रेंजर भगवान बड़ोले पर स्कूल संचालक विनय तिवारी से 12 लाख रुपए रिश्वत मांगने का आरोप है। तिवारी का स्कूल एरोड्रम रोड पर स्थित है। आरोप है कि अधिकारी स्कूल की बिल्डिंग को वन भूमि पर बना बताकर तोड़ने की धमकी दे रहे थे और इसके बदले रिश्वत मांग रहे थे।

लोकायुक्त पुलिस ने दो बार एसडीओ को ट्रैप करने की कोशिश की, लेकिन वह फोन नहीं उठाते थे। बाद में शिकायतकर्ता को रिकॉर्डिंग मशीन दी गई। रिकॉर्डिंग में एसडीओ बर्मन सत्य साईं चौराहे पर शिकायतकर्ता से पौन घंटे तक 12 लाख की रिश्वत की मांग करते सुने गए। सबूत पुख्ता होने के बाद केस दर्ज किया गया।

प्रशासनिक चुप्पी सवालों के घेरे में
लोकायुक्त की सिफारिश के बावजूद अभियोजन स्वीकृति में हो रही देरी ने अफसरों की नीयत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। माना जा रहा है कि राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के चलते बर्मन को बचाने की कोशिश की जा रही है। यदि शीघ्र निर्णय नहीं हुआ तो यह मामला भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की कथित ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति की पोल खोल सकता है।

एसडीओ एल्विन बर्मन के खिलाफ रिश्वत मामले में सबूत और जांच रिपोर्ट स्पष्ट हैं। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह ईमानदारी और पारदर्शिता के अपने दावों को कितना गंभीरता से लागू करती है। यदि अभियोजन स्वीकृति में और देर हुई, तो यह न केवल लोकायुक्त संगठन की साख को ठेस पहुंचाएगा, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को भी कमजोर करेगा।