फसल सुरक्षा के नाम पर खेतों में बिछी अवैध बिजली बनी जानलेवा; अधिकांश मामले अब भी न्यायालयों में लंबित
कांग्रेस विधायक अजय सिंह के प्रश्न पर विधानसभा में सरकार ने दिया जवाब
गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश में फसलों की सुरक्षा के लिए खेतों में छोड़े गए अवैध विद्युत करंट ने पिछले दस वर्षों में वन्यजीव संरक्षण की तस्वीर को झकझोर कर रख दिया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्षवार घटनाओं में कुल 341 वन्यजीवों की करंट लगने से मौत दर्ज की गई, जिनमें 28 बाघ, 36 तेंदुए और 23 भालू जैसे संरक्षित जीव शामिल हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि इन घटनाओं में 420 किसानों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किए गए, लेकिन अब तक केवल 10 मामलों में ही दोष सिद्ध होकर सजा हो सकी है, जबकि अधिकांश प्रकरण न्यायालयों में लंबित पड़े हैं।
राज्य सरकार ने यह जानकारी विधानसभा में कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक अजय सिंह के प्रश्न के लिखित उत्तर में दी। जवाब में बताया गया कि बाघ और तेंदुए के अलावा 27 नीलगाय, 9 चीतल सहित अनेक अन्य वन्य प्राणी भी अवैध करंट की चपेट में आए।
वन विभाग के अनुसार कुछ किसान जंगली जानवरों से फसल बचाने के लिए खेतों की मेड़ों पर बिजली का प्रवाह छोड़ देते हैं। यह करंट न केवल फसल नष्ट करने आए जानवरों को बल्कि दुर्लभ वन्यजीवों को भी मौत के घाट उतार देता है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान नियमों के तहत 25 प्रतिशत से अधिक फसल नुकसान होने पर ही मुआवजा दिया जाता है। कम नुकसान की भरपाई का कोई प्रावधान नहीं है। जानकारों का मानना है कि यही व्यवस्था किसानों को अवैध और खतरनाक उपाय अपनाने की ओर धकेलती है।
शहडोल परिक्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित
वन क्षेत्रों से लगे जिलों में घटनाओं की संख्या अधिक सामने आई है। विशेष रूप से शहडोल परिक्षेत्र में पिछले दस वर्षों में 91 वन्यजीवों की मौत दर्ज की गई। यहां 11 बाघ, 6 तेंदुए, 13 भालू, 6 नीलगाय, 22 तोते और एक हाथी तक करंट से मारे गए। यह आंकड़ा मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीरता को रेखांकित करता है।
वन अधिकारियों के अनुसार शहडोल, उमरिया, अनूपपुर और मंडला जैसे क्षेत्रों में खेत और वन क्षेत्र की सीमाएं स्पष्ट रूप से अलग नहीं हैं, जिससे संघर्ष की आशंका अधिक रहती है।
दंड नहीं, समग्र समाधान जरूरी
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि केवल प्रकरण दर्ज करने या गिरफ्तारी से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। उनका सुझाव है कि सौर ऊर्जा आधारित बाड़ (सोलर फेंसिंग), सामुदायिक फसल सुरक्षा योजना, त्वरित और पारदर्शी मुआवजा व्यवस्था, ग्राम स्तरीय निगरानी समितियां और जनजागरूकता अभियान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
विशेषज्ञों का यह भी मत है कि यदि संरक्षण और आजीविका के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो संरक्षित वन्यजीवों की संख्या पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।
मध्यप्रदेश, जो बाघों की सर्वाधिक संख्या के लिए जाना जाता है, वहां करंट से हो रही मौतें संरक्षण प्रयासों पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रही हैं। आंकड़े स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि मानव-वन्यजीव संघर्ष अब केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि नीति और प्रशासनिक संवेदनशीलता का भी विषय बन चुका है।

