वन भवन भोपाल

वीडियो वायरल होने के बाद खुली परतें… एक महीने बाद हुई कार्रवाई; जांच में प्राकृतिक मृत्यु नहीं, शिकार की पुष्टि

गणेश पाण्डेय, भोपाल। सिवनी मालवा वन परिक्षेत्र में काले हिरण के शिकार प्रकरण में एक महीने बाद वन विभाग ने बड़ी कार्रवाई करते हुए रेंजर आशीष रावत सहित छह वनकर्मियों को निलंबित कर दिया है। घटना 21 जनवरी की है, जिसमें शिकारियों को बचाने और सबूत मिटाने के प्रयास का वीडियो ग्रामीणों ने बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया था।

विभागीय आदेश के अनुसार रेंजर आशीष रावत, वनपाल महेश गौर, वनरक्षक मनीष गौर, रूपक झा, ब्रजेश पगारे और पवन उइके को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है। आरोप है कि वनकर्मियों ने गोली से मृत काले हिरण को जलाकर साक्ष्य नष्ट करने का प्रयास किया तथा एक अन्य हिरण को बोरी में भरकर ले जाने की कोशिश की। वीडियो वायरल होने के बावजूद प्रारंभिक स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। मामला जब अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (एपीसीसीएफ) एल. कृष्णमूर्ति तक पहुंचा, तब मुख्यालय से निर्देश जारी हुए और इसके बाद जांच कर कार्रवाई की गई।

जांच रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे

जांच प्रतिवेदन में स्पष्ट किया गया है कि काले हिरण की मृत्यु प्राकृतिक नहीं, बल्कि शिकार से संबंधित थी। प्रारंभिक स्तर पर वन स्टाफ ने इसे प्राकृतिक मृत्यु के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया था। जांच में पाया गया कि घटनास्थल पर एक जीवित काला हिरण बंधे पैर के साथ मिला, जबकि दूसरा मृत अवस्था में था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य साक्ष्यों से यह पुष्टि हुई कि हिरणों को पकड़कर ले जाया जा रहा था।

साक्ष्य नष्ट करने और धाराएं कमजोर लगाने के आरोप

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि उपलब्ध महत्वपूर्ण साक्ष्यों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई। परीक्षण के लिए लिए गए जैविक नमूनों को सुरक्षित रखने के बजाय नष्ट कर दिया गया। अपराध की गंभीर धाराएं लगाने और आरोपियों की पहचान सुनिश्चित करने में भी लापरवाही सामने आई है। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि काला हिरण संरक्षित प्रजाति है और इस प्रकार की घटना न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि वन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।

विभागीय कार्रवाई पर उठे सवाल

घटना 21 जनवरी की थी, लेकिन वीडियो अधिकारियों तक पहुंचने में 15 दिन लग गए। इसके बाद भी कार्रवाई में देरी हुई। लगभग एक महीने बाद निलंबन की कार्रवाई से विभाग की आंतरिक निगरानी प्रणाली पर प्रश्नचिह्न लग गए हैं। फिलहाल मामले में विभागीय जांच जारी है और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ आगे की अनुशासनात्मक कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।