गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश में 1991 बैच के आईएफएस अधिकारी एवं मुख्य वन्यप्राणी अभिरक्षक शुभरंजन सेन को वन बल प्रमुख बनाए जाने के आदेश पर पुनर्विचार की मांग उठी है। 1987 बैच के सेवानिवृत्त एपीसीसीएफ और सिस्टम परिवर्तन अभियान के अध्यक्ष आजाद सिंह डबास ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखकर चयन प्रक्रिया और अधिकारी की पात्रता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
डबास ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि विभागीय पदोन्नति समिति द्वारा भेजे गए पैनल में सेन का नाम तीसरे क्रम पर था। उन्होंने सवाल उठाया कि इतने महत्वपूर्ण पद के लिए अधिकारी की सेवा अवधि, मैदानी अनुभव और दायित्वों का समुचित मूल्यांकन क्यों नहीं किया गया। पत्र में कहा गया है कि वन विभाग में क्षेत्रीय स्तर पर वन मंडलाधिकारी, वन संरक्षक और मुख्य वन संरक्षक जैसे पदों पर कार्य का अनुभव अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, किंतु सेन इन पदों पर कभी पदस्थ नहीं रहे।
मैदानी अनुभव को लेकर आपत्ति
पत्र में दावा किया गया है कि सेन ने वन मंडलाधिकारी (उत्पादन एवं सामाजिक वानिकी) का दायित्व भी नहीं निभाया और न ही उपवनमंडलाधिकारी प्रशिक्षण प्राप्त किया। डबास के अनुसार, वन्यप्राणी क्षेत्र को छोड़कर विभाग के मैदानी कार्यों का अनुभव न होने के कारण वे वन बल प्रमुख के व्यापक दायित्वों के निर्वहन में सक्षम नहीं हो सकते।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि भारत सरकार में पदस्थ मध्यप्रदेश कैडर के दो वरिष्ठ अधिकारियों—असित गोपाल और रेनू सिंह—ने भी इस पद के लिए सहमति दी थी, लेकिन डीपीसी में उनके नामों पर चर्चा नहीं की गई। डबास ने इसे प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी बताते हुए कहा कि यदि इन नामों पर विचार होता तो पैनल की स्थिति अलग होती।
वन्यप्राणी प्रबंधन पर सवाल
डबास ने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि सेन के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) रहते वर्ष 2025 में 55 बाघों की मृत्यु हुई, जो विभागीय इतिहास में सर्वाधिक बताई जा रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के कथित उल्लंघन के दो मामलों में कार्रवाई नहीं की गई।
पत्र में वित्तीय अनियमितताओं और लापरवाही के आरोप भी लगाए गए हैं। पेंच टाइगर रिजर्व में कथित रूप से केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की अनुमति के बिना टाइगर सफारी निर्माण, टाइगर स्ट्राइक फोर्स की लापरवाही, और अवैध रिसॉर्ट संरक्षण जैसे मामलों का उल्लेख करते हुए डबास ने जांच की मांग की है।
सरकार की चुप्पी
अब तक राज्य सरकार या संबंधित अधिकारी की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। वन बल प्रमुख जैसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति को लेकर उठे सवालों ने प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है। यदि सरकार इस मामले में पुनर्विचार करती है, तो चयन प्रक्रिया और आरोपों की समीक्षा संभावित मानी जा रही है।
