बांधवगढ़ टाइगर मौत मामला गहराया, दूसरी पोस्टमार्टम रिपोर्ट से उठे नए सवाल
गणेश पाण्डेय, भोपाल। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में 24 मई को मृत मिले नर बाघ की दूसरी पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आने के बाद पूरा मामला और अधिक उलझ गया है। रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है कि जिस स्थान पर बाघ को डार्ट किया गया था, वहां रक्त का थक्का नहीं पाया गया। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति सामान्यतः तब सामने आती है जब डार्ट किसी जीवित नहीं बल्कि मृत प्राणी को लगाया गया हो। इस खुलासे के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिस बाघ ने एक महिला की जान ली और तीन अन्य लोगों को घायल किया, वह अचानक कैसे मर गया। बाघ की मौत का वास्तविक कारण अब भी रहस्य बना हुआ है, जबकि मामले को लेकर प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन भी नाराजगी जता चुके हैं।
वन विभाग की ओर से 28 मई को प्रधान मुख्य वन संरक्षक समिता राजौर के हस्ताक्षर से जारी प्रेस विज्ञप्ति ने भी कई नए विवादों को जन्म दे दिया है। विज्ञप्ति में बाघ की शारीरिक स्थिति, स्वास्थ्य और पोस्टमार्टम संबंधी जानकारियां तो दी गई हैं, लेकिन मौत का स्पष्ट कारण नहीं बताया गया। यही कारण है कि वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञ और सेवानिवृत्त अधिकारी पूरे घटनाक्रम पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बाघ लंबे समय तक निष्क्रिय पड़ा था और उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही थी तो डार्टिंग से पहले उसकी स्थिति की पुष्टि की जानी चाहिए थी। सामान्य प्रक्रिया के तहत बांस, लकड़ी या किसी अन्य वस्तु की सहायता से उसकी प्रतिक्रिया जांची जा सकती थी। वन्यजीव चिकित्सकों के अनुसार मृत अथवा अचेत अवस्था की पुष्टि के लिए खाली सुई वाली डार्ट अथवा अन्य सुरक्षित परीक्षण विधियां भी उपलब्ध हैं। ऐसे में मृत बाघ को डार्ट करना गंभीर पेशेवर लापरवाही माना जा रहा है।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया विरोधाभास
दूसरी पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार बाघ के शरीर पर जहां डार्ट लगी थी, वहां रक्तस्राव अथवा खून का थक्का नहीं पाया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी जीवित बाघ को डार्ट किया जाता है तो उस स्थान पर रक्त परिसंचरण के कारण स्पष्ट जैविक प्रतिक्रिया दिखाई देती है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि बाघ के महत्वपूर्ण अंगों में कंजेस्टिव और हेमरेजिक परिवर्तन पाए गए। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार कंजेस्टिव स्थिति तब उत्पन्न होती है जब हृदय शरीर की आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त रक्त पंप नहीं कर पाता, जबकि हेमरेजिक परिवर्तन रक्त वाहिकाओं से जुड़े गंभीर विकारों की ओर संकेत करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परिस्थितियां कुछ मामलों में डार्टिंग के दौरान प्रयुक्त दवाओं तथा समय पर एंटी-डोट नहीं दिए जाने से भी उत्पन्न हो सकती हैं। हालांकि इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है।
बीमार बाघ ने कैसे किया हमला?
वन विभाग की विज्ञप्ति में दावा किया गया है कि नर बाघ की स्वास्थ्य स्थिति बेहद खराब थी। रिपोर्ट के अनुसार उसकी मांसपेशियां पीली और सूखी थीं, पाचन तंत्र खाली था तथा त्वचा खुरदरी और बेजान हो चुकी थी। यही तथ्य अब नए सवाल खड़े कर रहे हैं। विशेषज्ञ पूछ रहे हैं कि यदि बाघ इतनी खराब शारीरिक स्थिति में था तो वह जंगल से निकलकर गांव तक कैसे पहुंचा और फिर एक महिला की जान लेने के साथ तीन अन्य लोगों को घायल करने जैसी आक्रामक गतिविधियां कैसे कर सका। यदि वह लंबे समय से अस्वस्थ था तो उसकी निगरानी क्यों नहीं की जा रही थी और क्या प्रबंधन को पहले से इसकी जानकारी थी? इन सवालों का जवाब अब तक विभाग की ओर से नहीं दिया गया है।
तस्वीरों ने बढ़ाया संदेह, गर्दन पर दिखे लाल निशान
वन्य प्राणी शाखा द्वारा जारी मृत बाघ की तस्वीरों में उसकी गर्दन पर लाल रंग के डॉट जैसे निशान स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। दूसरी ओर आधिकारिक पोस्टमार्टम विज्ञप्ति में उल्लेख किया गया है कि डार्ट बाघ के दाहिने कंधे पर लगी थी। तस्वीरों और दस्तावेजों के बीच इस अंतर ने पूरे मामले को और संदिग्ध बना दिया है। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि घटनास्थल, तस्वीरों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के तथ्यों का मिलान किए बिना मौत के वास्तविक कारण तक पहुंचना मुश्किल होगा। उनका मानना है कि पूरे मामले की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जानी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि बाघ की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई, किसी बीमारी से हुई या फिर बचाव अभियान के दौरान कोई गंभीर चूक हुई।
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में हुई इस घटना ने वन्यजीव प्रबंधन और रेस्क्यू प्रोटोकॉल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर विभाग बाघ की खराब स्वास्थ्य स्थिति को मौत का कारण मानने की दिशा में संकेत दे रहा है, वहीं दूसरी ओर पोस्टमार्टम रिपोर्ट, तस्वीरों और घटनाक्रम में सामने आए विरोधाभास पूरे मामले को रहस्यमय बना रहे हैं। जब तक मौत के वास्तविक कारण का स्पष्ट और वैज्ञानिक निष्कर्ष सामने नहीं आता, तब तक यह मामला वन विभाग के लिए असहज सवालों का कारण बना रहेगा।

