रिलीज से लेकर प्रजनन तक, चार साल में चीतों के व्यवहार और अनुकूलन को समझने का सफर
गणेश पाण्डेय, भोपाल। चीता प्रोजेक्ट में फील्ड डायरेक्टर के रूप में चार साल काम कर चुके उत्तम शर्मा ने कूनो में चीतों को जंगल में बसाने की प्रक्रिया और इस दौरान सामने आई चुनौतियों का विस्तृत अनुभव साझा किया है। शर्मा के अनुसार, किसी चीते को उसके प्राकृतिक आवास में दोबारा बसाना केवल बाड़े का गेट खोलकर उसे जंगल में छोड़ देना नहीं है। इसके लिए चरणबद्ध प्रबंधन, लगातार निगरानी, जरूरत पड़ने पर रेस्क्यू और चीतों के व्यवहार को समझने की प्रक्रिया जरूरी होती है। उनके अनुभव में कूनो में चीतों को बसाने की यात्रा धीरे-धीरे रिलीज से अनुकूलन, फिर प्रजनन और स्थायी जंगली आबादी की दिशा में आगे बढ़ी।
पहले जंगल में छोड़ा, मॉनसून में फिर बोमा लाना पड़ा
शर्मा बताते हैं कि परियोजना के शुरुआती वर्ष में ही चीतों को जंगल में छोड़ने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी। हालांकि मॉनसून की परिस्थितियों के कारण सभी चीतों को वापस सॉफ्ट रिलीज बोमा (SRB) में लाना पड़ा। इसके बाद प्रबंधन टीम ने चीतों को अलग-अलग चरणों में जंगल में छोड़ने की रणनीति अपनाई।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य चीतों को अचानक खुले जंगल में छोड़ने के बजाय उनकी परिस्थितियों के अनुसार धीरे-धीरे प्राकृतिक वातावरण में स्थापित करना था। हर रिलीज के बाद उनकी गतिविधियों, घूमने के क्षेत्र और व्यवहार पर नजर रखी गई।

पवन और आशा ने शुरू में ही खींचा ध्यान
कूनो में शुरुआती दौर में कुछ चीते लोगों के बीच खासे चर्चित हो गए। शर्मा के मुताबिक, पवन, जिसे पहले ओबान के नाम से जाना जाता था, और आशा मई 2023 तक ही लोगों के बीच पहचाने जाने लगे थे।
पवन की गतिविधियां खास तौर पर चर्चा में रहीं। उसने कूनो के निर्धारित क्षेत्र से आगे जाकर लंबी दूरी तय की और चंबल नदी पार कर राजस्थान में प्रवेश करने वाला पहला चीता बना। बाद में राजस्थान में चंबल के आसपास उसका रेस्क्यू किया गया। शर्मा के अनुसार, पवन की गतिविधियों ने यह समझने में मदद की कि चीते नई जगहों को तलाशने और लंबी दूरी तय करने की क्षमता रखते हैं।
चीते को ट्रैक करना बाघ से बिल्कुल अलग अनुभव
शर्मा का इससे पहले पन्ना टाइगर रिजर्व में फील्ड डायरेक्टर के तौर पर बाघों की निगरानी का अनुभव रहा था। लेकिन उनका कहना है कि चीते को ट्रैक करना पूरी तरह अलग और काफी हद तक नया अनुभव था।
पहली गर्मियों ने टीम को यह समझने का अवसर दिया कि बड़े क्षेत्र में फैले चीतों की निगरानी और प्रबंधन के लिए किस तरह की व्यवस्था की आवश्यकता होगी। 2024 में कई बार चीतों को जंगल में छोड़ा गया। इन रिलीज के दौरान उनके व्यवहार और गतिविधियों से टीम को लगातार नई जानकारी मिली।

हर रेस्क्यू ऑपरेशन बना नई सीख
पवन के राजस्थान चले जाने और बाद में उसके रेस्क्यू जैसी घटनाओं ने टीम को मुश्किल परिस्थितियों में चीतों को संभालने का व्यावहारिक अनुभव दिया। शर्मा के मुताबिक, जब कोई चीता आबादी वाले क्षेत्र में पहुंच जाए, कठिन भूभाग में चला जाए या ऐसी जगह मौजूद हो जहां सीधे पहुंचना मुश्किल हो, तब रेस्क्यू अपने आप में बड़ी चुनौती बन जाता है।
ऐसे प्रत्येक ऑपरेशन से टीम को यह समझने में मदद मिली कि अलग-अलग परिस्थितियों में चीते के साथ किस तरह व्यवहार करना है और उसे सुरक्षित तरीके से वापस प्रबंधन क्षेत्र में कैसे लाना है।
सबसे बड़ी चुनौती बनीं बच्चों वाली मादा चीते
शर्मा के अनुसार, असली चुनौती तब सामने आई जब प्रबंधन टीम के सामने शावकों वाली मादा चीतों को जंगल में छोड़ने का सवाल आया। उन्हें कब छोड़ा जाए, किस तरीके से छोड़ा जाए और जंगल में उनके तथा शावकों के लिए किस तरह की परिस्थितियां बनाई जाएं—इन सभी पहलुओं पर सावधानी से विचार करना पड़ा।

कुछ लोगों को यह आशंका थी कि चीतों को लंबे समय तक सॉफ्ट रिलीज बोमा में रखने से उनकी जंगल में जीवित रहने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। लेकिन शर्मा के मुताबिक, चीतों ने इस आशंका को गलत साबित किया और जंगल में छोड़े जाने के बाद उन्होंने प्राकृतिक परिस्थितियों में खुद को ढालने की क्षमता दिखाई।
जंगल में जोखिम भी, मौतें भी हुईं
खुले जंगल में जाने के बाद जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होते। शर्मा ने स्वीकार किया कि जंगल में छोड़े जाने के बाद कुछ चीतों की मौत भी हुई। उनके अनुसार, प्राकृतिक वातावरण में रहने वाले वन्यजीवों के जीवन में प्राकृतिक और दुर्घटनाजनित जोखिम मौजूद रहते हैं।
हालांकि, उनके आकलन में चीतों को जंगल में बसाने की प्रक्रिया का कुल परिणाम सकारात्मक रहा। हर बार चीतों को जंगल में छोड़ने के बाद टीम को भारतीय परिस्थितियों में उनके व्यवहार और क्षमताओं को समझने का नया अवसर मिला।
मेटिंग शुरू हुई तो मिला अनुकूलन का बड़ा संकेत
चीतों के भारतीय जंगल में अनुकूलन का सबसे महत्वपूर्ण संकेत तब मिला जब उन्होंने जंगल में प्रजनन के लिए मिलन शुरू किया। शर्मा के मुताबिक, यह केवल सामान्य व्यवहार की घटना नहीं थी, बल्कि इससे संकेत मिला कि चीते उस क्षेत्र में महज जीवित नहीं रह रहे थे, बल्कि प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुरूप व्यवहार करने लगे थे।
यही किसी पुनर्स्थापना परियोजना की बड़ी कसौटी होती है। किसी प्रजाति को दूसरे क्षेत्र से लाकर कुछ समय तक जीवित रखना और बात है, जबकि उसका प्राकृतिक व्यवहार अपनाना और आगे प्रजनन करना अलग स्तर की सफलता का संकेत माना जाता है।
2026 में KGP12 ने जंगल में दिए शावकों को जन्म
इस यात्रा में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव तब आया जब भारत में जन्मी मादा चीता KGP12 ने 2026 में जंगल में शावकों को जन्म दिया। हालांकि उसके शावक करीब एक महीने ही जीवित रह सके, लेकिन शर्मा के अनुसार इस घटना का महत्व शावकों के जीवित रहने की अवधि से कहीं बड़ा था।
इससे यह संकेत मिला कि भारत में जन्मी मादा ने जंगल को अपने प्राकृतिक आवास के रूप में स्वीकार करते हुए वहां प्रजनन किया। यानी चीतों का व्यवहार केवल प्रबंधन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि खुले जंगल में भी उनके प्राकृतिक जीवन चक्र की शुरुआत हुई।
री-इंट्रोडक्शन का असली मकसद क्या है?
शर्मा के अनुभव के मुताबिक, चीता पुनर्स्थापना का उद्देश्य केवल किसी दूसरे देश से जानवर लाकर उन्हें जंगल में छोड़ देना नहीं है। वास्तविक लक्ष्य यह है कि चीते जंगल में खुद जीवित रहें, प्राकृतिक व्यवहार करें, प्रजनन करें और समय के साथ अपनी जंगली आबादी स्थापित करें।
कूनो में अब तक की यात्रा को इसी क्रम में देखा जा सकता है—पहले चीतों को नियंत्रित परिस्थितियों से जंगल में लाना, फिर उनकी गतिविधियों और व्यवहार को समझना, जरूरत पड़ने पर रेस्क्यू करना, दोबारा रिलीज करना और अंततः उन्हें प्रजनन करते देखना।

चार साल में बदली प्रबंधन टीम की समझ
शर्मा के चार साल के अनुभव का महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि चीतों के साथ काम करते हुए प्रबंधन टीम की समझ लगातार विकसित हुई। शुरुआत में जो बातें अनुमान और आशंकाओं पर आधारित थीं, वे धीरे-धीरे मैदानी अनुभव में बदलती गईं।
चीतों के लंबे सफर, उनके फैलाव, रेस्क्यू, जंगल में वापसी और प्रजनन की घटनाओं ने टीम को भारतीय परिस्थितियों में इस प्रजाति के व्यवहार को समझने का अवसर दिया।
कूनो में चीता पुनर्स्थापना की कहानी इसलिए सिर्फ चीतों को भारत वापस लाने की कहानी नहीं है। यह उस लंबी प्रक्रिया की कहानी है जिसमें एक विदेशी वातावरण से आए वन्यजीव को नए प्राकृतिक आवास में ढलना, अपने क्षेत्र तलाशना, जोखिमों का सामना करना, प्रजनन करना और अंततः जंगली आबादी के रूप में स्थापित होना है। शर्मा के चार साल के अनुभव में यही सफर कूनो के चीता प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी सीख के रूप में सामने आता है।

