प्रमुख सचिव वन राघवेन्द्र सिंहराघवेन्द्र सिंह, प्रमुख सचिव वन

वन व्यवस्थापन की लंबित फाइलों और CFR अधिकारों पर मुख्यालय की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में

गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश में वन व्यवस्थापन के प्रकरणों को मुख्यालय स्तर पर छोटी-छोटी आपत्तियों के नाम पर लंबे समय तक लंबित रखने की कार्यप्रणाली पर प्रमुख सचिव वन राघवेन्द्र सिंह ने नाराजगी जताई है। मंगलवार को हुई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में उन्होंने वन मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि आपत्ति लगाने के बजाय उसका निराकरण कराया जाए और फाइलों को अनावश्यक रूप से लंबित न रखा जाए। उन्होंने कहा कि यदि किसी प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं करना चाहते तो फाइल उन्हें भेजी जाए, लेकिन आपत्ति लगाकर फाइल रोकने की प्रवृत्ति स्वीकार नहीं की जाएगी।

पीएस वन ने अधिकारियों से कहा कि आवश्यकता होने पर संबंधित डीएफओ को भोपाल बुलाकर मौके पर ही आपत्ति का निराकरण कराया जाए। वन व्यवस्थापन की प्रक्रिया में वन मंडलों की ओर से भारतीय वन अधिनियम के तहत धारा 5 से धारा 19 तक की कार्रवाई पूरी करने के बाद धारा 20 के तहत अंतिम अधिसूचना के लिए प्रस्ताव मुख्यालय भेजे जाते हैं। बताया जा रहा है कि जबलपुर, कटनी, नरसिंहपुर सहित आधा दर्जन से अधिक वन मंडलों के प्रस्ताव मुख्यालय स्तर पर लंबित हैं। फील्ड अधिकारियों के अनुसार इनमें एक प्रमुख आपत्ति कलेक्टर के हस्ताक्षर से संबंधित है।

कलेक्टर के हस्ताक्षर की आपत्ति से अटकी फाइलें

वन व्यवस्थापन के प्रस्तावों में कलेक्टर के हस्ताक्षर को लेकर लगाई जा रही आपत्ति अब मुख्यालय की कार्यप्रणाली का महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है। फील्ड स्तर पर अधिकारियों का कहना है कि वन मंडल आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने के बाद प्रस्ताव मुख्यालय भेजते हैं, लेकिन एक जैसी आपत्तियों के कारण फाइलें वापस होती रहती हैं।

पीएस वन का निर्देश इस व्यवस्था को बदलने की दिशा में देखा जा रहा है। उनका कहना था कि यदि प्रक्रिया में व्यावहारिक अड़चन है तो विभागीय अधिकारी समाधान निकालें, न कि फाइल को आपत्ति लगाकर रोक दें।

वन व्यवस्थापन से संबंधित प्रकरणों में जमीन की वैधानिक स्थिति और वन सीमा का निर्धारण महत्वपूर्ण होता है। हाल के सरकारी रिकॉर्ड में भी मध्यप्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में भारतीय वन अधिनियम के तहत वनखंडों को अधिसूचित किए जाने की प्रक्रिया जारी दिखाई देती है। अप्रैल 2025 में सिंगरौली जिले के चितरंगी तहसील के कचुआ वन परिक्षेत्र में भारतीय वन अधिनियम की धारा 29 के तहत संरक्षित वन घोषित करने की अधिसूचना प्रकाशित हुई थी।

600 से ज्यादा वनखंडों का अंतिम नोटिफिकेशन अधूरा!

वन व्यवस्थापन की धीमी प्रक्रिया का असर प्रदेश की वन-राजस्व सीमा व्यवस्था पर भी पड़ता है। विभागीय स्तर पर लंबे समय से यह बात सामने आती रही है कि मध्यप्रदेश में 600 से अधिक वनखंडों का अंतिम नोटिफिकेशन लंबित है।

अंतिम अधिसूचना नहीं होने की स्थिति में कई स्थानों पर वन और राजस्व भूमि की सीमा को लेकर विवाद बने रहने की आशंका रहती है। इसका असर अतिक्रमण, भूमि उपयोग, राजस्व रिकॉर्ड और वन विभाग के अधिकार क्षेत्र से जुड़े मामलों पर पड़ सकता है।

विधानसभा के एक हालिया जवाब में भी वन भूमि की वैधानिक स्थिति और वन व्यवस्थापन अधिकारियों के समक्ष चल रही कार्यवाही का उल्लेख मिलता है। फरवरी 2026 के विधानसभा रिकॉर्ड में नर्मदापुरम संभाग के हरदा, नर्मदापुरम और बैतूल जिलों में भारतीय वन अधिनियम की धारा 4 से संबंधित वन व्यवस्थापन प्रकरणों की स्थिति पर जानकारी दी गई है।

ऐसे में पीएस वन की नाराजगी को केवल अधिकारियों को दी गई सामान्य नसीहत के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे फाइल-आपत्ति और फाइल वापसी की लंबी प्रक्रिया को खत्म करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

अतिक्रमण हटाया तो सीएम हेल्पलाइन पर बढ़ीं शिकायतें

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में सीएम हेल्पलाइन के लंबित प्रकरणों की भी समीक्षा की गई। विदिशा, सिंगरौली और दमोह में बड़ी संख्या में शिकायतें लंबित होने पर पीएस वन ने अधिकारियों से कारण पूछा।

विदिशा डीएफओ की ओर से बताया गया कि जिले में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई चल रही है और कार्रवाई से प्रभावित लोग सीएम हेल्पलाइन पर शिकायतें कर रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि कुछ मामलों में शिकायतों की संख्या बढ़ना विभागीय निष्क्रियता के बजाय अतिक्रमण के खिलाफ की जा रही कार्रवाई का परिणाम भी हो सकता है।

हालांकि शिकायत किसी कार्रवाई के विरोध में हो या किसी अन्य कारण से, उसका समय-सीमा में परीक्षण और निराकरण विभाग की जिम्मेदारी बनी रहती है।

CFR पर सवाल: ग्रामसभा को अधिकार नहीं देना तो आपत्ति क्यों नहीं?

बैठक में सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन अधिकार यानी CFR Rights का मुद्दा भी चर्चा में आया। इसके तहत ग्रामसभाओं को उनके पारंपरिक वन संसाधनों की सुरक्षा, पुनरुत्पादन, संरक्षण और प्रबंधन से जुड़े अधिकार दिए जाने का प्रावधान है।

बैठक में वन विकास निगम के एमडी एवं पूर्व पीसीसीएफ भू-अभिलेख मनोज अग्रवाल की ओर से यह तर्क रखा गया कि मध्यप्रदेश में ऐसे जंगल नहीं हैं, जिनका प्रबंधन ग्रामसभा अथवा ग्रामवासियों को सौंपा जाए और यह व्यवस्था मुख्य रूप से पूर्वोत्तर राज्यों में लागू है।

इस पर पीएस वन राघवेन्द्र सिंह ने सवाल किया कि यदि विभाग को इस व्यवस्था पर आपत्ति है तो राज्यपाल के समक्ष अपनी आपत्ति क्यों नहीं दर्ज कराई गई?

जब अधिकारियों की ओर से यह बताया गया कि विभाग को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं मिलता, तो सवाल और गंभीर हो गया। यदि विभाग के पास इस व्यवस्था को लेकर प्रशासनिक या कानूनी आपत्ति है तो उसे सक्षम संवैधानिक मंच के सामने रखने की पहल कौन करेगा, यह भी चर्चा का विषय बना।

इन मुद्दों पर भी हुई समीक्षा

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में वन विभाग के कामकाज से जुड़े कई अन्य विषयों की भी समीक्षा की गई। इनमें प्रमुख रूप से—

  • लोक सेवा गारंटी अधिनियम के तहत लंबित प्रकरण
  • वन ग्रामों को राजस्व ग्रामों में बदलने की SOP के अनुसार कार्रवाई
  • प्रमुख सचिव/सचिव को प्राप्त नोटिस से जुड़े लंबित न्यायालयीन अवमानना प्रकरण
  • अवमानना मामलों में विभाग की ओर से पक्ष रखने की स्थिति
  • लंबित ऑडिट कंडिकाओं की समीक्षा
  • CAMPA मद से हुए व्यय की समीक्षा
  • वन संरक्षण अधिनियम के तहत लंबित प्रकरण शामिल रहे।

पीएस वन का संदेश इस पूरी बैठक में सबसे स्पष्ट रहा—प्रक्रिया में कमी है तो उसे दूर किया जाए, लेकिन आपत्ति लगाकर फाइल को वर्षों तक लंबित रखना समाधान नहीं है। वन व्यवस्थापन के लंबित प्रकरणों से लेकर सीएम हेल्पलाइन और CFR तक, बैठक में विभागीय कामकाज की गति और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर ही सबसे ज्यादा जोर दिखाई दिया।