पन्ना में वन्यजीव सुरक्षा के दावों पर बड़ा सवाल, संवेदनशील बीट में सांभर की संदिग्ध मौत, एपीसीसीएफ ने जांच के दिए निर्देश
गणेश पाण्डेय, भोपाल। उत्तर पन्ना वनमंडल के पन्ना वन परिक्षेत्र की केरबन बीट में फीमेल सांभर की संदिग्ध मौत ने वन विभाग की गश्त, सूचना व्यवस्था और वन्यजीव अपराधों की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कंपार्टमेंट पी-387 में 1 सितंबर 2026 को सांभर के अवशेष मिलने की जानकारी सामने आई है। घटनास्थल की तस्वीरों और उपलब्ध GPS लोकेशन में सांभर का पिछला हिस्सा कटा हुआ दिखाई दे रहा है। स्थानीय चौकीदार के अनुसार अवशेष नाले में फेंक दिए गए। सबसे गंभीर तथ्य यह है कि घटना के कई दिन बाद तक उत्तर पन्ना के रेंजर और डीएफओ को इसकी जानकारी नहीं थी। भोपाल से एपीसीसीएफ वन्यप्राणी एल. कृष्णमूर्ति द्वारा डीएफओ धीरेन्द्र सिंह को मामले की जानकारी दिए जाने के बाद जांच के निर्देश दिए गए हैं।
घटनास्थल की तस्वीर ने खड़े किए सवाल
उपलब्ध तस्वीर में मृत सांभर के शरीर का पिछला हिस्सा सामान्य प्राकृतिक क्षति की बजाय काटे जाने जैसा दिखाई देता है। हालांकि केवल तस्वीर के आधार पर शिकार की पुष्टि नहीं की जा सकती, लेकिन इस स्थिति को देखते हुए मामले की निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच जरूरी है। यदि सांभर को किसी धारदार हथियार से काटा गया है, तो यह वन्यजीव अपराध का गंभीर मामला हो सकता है। दूसरी ओर, यदि सांभर की मौत बाघ के हमले में हुई है, तो उसके किल के प्रमाण, पंजों के निशान, शरीर पर दांतों के निशान और घटनास्थल की अन्य परिस्थितियां जांच में सामने आनी चाहिए।
यह भी पता लगाना होगा कि सांभर की मौत के बाद उसके अवशेष किसने हटाए, उन्हें नाले में क्यों फेंका गया और क्या विभाग ने उन्हें सुरक्षित कर वैज्ञानिक परीक्षण के लिए भेजा। वन्यजीव अपराधों की जांच में शव या अवशेषों का संरक्षण महत्वपूर्ण साक्ष्य होता है। यदि अवशेष उपलब्ध नहीं हैं, तो विभागीय जांच के सामने एक अहम साक्ष्य पहले ही कमजोर हो सकता है।
छह दिन तक सूचना तंत्र कैसे रहा निष्क्रिय?
केरबन बीट पन्ना टाइगर रिजर्व से लगी संवेदनशील वन सीमा में आती है। ऐसे क्षेत्र में वन्यप्राणियों की निगरानी, नियमित पैदल और रात्रि गश्त तथा किसी भी असामान्य गतिविधि की तत्काल सूचना देना मैदानी वन अमले की मूल जिम्मेदारी है। इसके बावजूद 1 सितंबर की घटना की जानकारी शनिवार तक वरिष्ठ अधिकारियों तक नहीं पहुंचना व्यवस्था की गंभीर कमजोरी को दर्शाता है।
सवाल यह नहीं है कि सूचना देर से क्यों मिली, बल्कि यह है कि क्या सूचना मिली ही नहीं, क्या सूचना दबा दी गई या फिर मैदानी अमले ने इसे गंभीरता से लिया ही नहीं? यदि चौकीदार को घटना की जानकारी थी, तो बीट गार्ड को कब बताया गया? बीट गार्ड ने रेंजर को सूचना क्यों नहीं दी? रेंजर और एसडीओ ने मौके का निरीक्षण क्यों नहीं किया? डीएफओ तक मामला पहुंचने में इतना समय क्यों लगा?
इन सवालों के जवाब विभागीय जांच में दर्ज होना जरूरी है, क्योंकि वन्यजीव अपराधों की रोकथाम केवल बाघों और सांभरों की संख्या बढ़ाने से नहीं होती। इसके लिए ऐसा सूचना तंत्र भी जरूरी है जो जंगल में होने वाली प्रत्येक संदिग्ध गतिविधि को समय पर वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाए।
डीएफओ ने शिकार से किया इनकार, बाघ के किल की संभावना बताई
डीएफओ उत्तर पन्ना धीरेन्द्र सिंह ने स्वीकार किया कि उन्हें घटना की जानकारी नहीं थी। उनका कहना है कि बीट गार्ड ने उन्हें मामले की सूचना नहीं दी। हालांकि उन्होंने सांभर के शिकार की संभावना से इनकार किया है। डीएफओ के अनुसार केरबन बीट पन्ना टाइगर रिजर्व से लगी हुई है और संभव है कि सांभर को बाघ ने मारा हो।
तस्वीर में सांभर का पिछला हिस्सा धारदार हथियार से काटे जाने जैसा दिखाई देने के सवाल पर डीएफओ ने असहमति जताई। उनका कहना था कि बाघ द्वारा शिकार किए गए वन्यप्राणी को खाने के दौरान भी शरीर का कोई हिस्सा अलग हो सकता है। यह संभावना पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती, लेकिन इसका निर्धारण केवल अनुमान से नहीं बल्कि वैज्ञानिक साक्ष्यों से होना चाहिए।
यदि विभाग बाघ के किल की संभावना को आधार मानता है, तो उसे यह भी बताना होगा कि घटनास्थल पर बाघ की मौजूदगी के क्या प्रमाण मिले। क्या आसपास पंजों के निशान मिले? क्या कैमरा ट्रैप या गश्ती दल के रिकॉर्ड में बाघ की गतिविधि दर्ज थी? क्या शव पर प्राकृतिक शिकारी के हमले के स्पष्ट निशान थे? इन सवालों का जवाब जांच के बिना नहीं मिल सकता।
एपीसीसीएफ ने दोनों पहलुओं से जांच के दिए निर्देश
एपीसीसीएफ वन्यप्राणी एल. कृष्णमूर्ति ने तस्वीर देखने के बाद मामले को गंभीरता से लिया है। उन्होंने डीएफओ को बाघ के किल और संभावित शिकार दोनों कोणों से जांच करने के निर्देश दिए हैं। उनका कहना है कि तस्वीर में कुछ हिस्सा कटा हुआ प्रतीत होता है और शिकार की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।
एपीसीसीएफ के निर्देश से स्पष्ट है कि विभाग ने अभी तक मामले को केवल प्राकृतिक मौत या बाघ के शिकार के रूप में अंतिम रूप से स्वीकार नहीं किया है। अब जांच में घटनास्थल का निरीक्षण, उपलब्ध अवशेषों की स्थिति, पोस्टमार्टम या वैज्ञानिक परीक्षण, गश्ती रिकॉर्ड और मैदानी अमले के बयानों की जांच महत्वपूर्ण होगी।
एक वरिष्ठ वन अधिकारी और वन्यप्राणी विशेषज्ञ के अनुसार, उपलब्ध तस्वीर के आधार पर शिकार की संभावना की गंभीरता से जांच आवश्यक है। उनके मुताबिक, इससे भी अधिक चिंताजनक पहलू यह है कि घटना के कई दिन बाद तक रेंजर और डीएफओ स्तर पर इसकी जानकारी नहीं थी।
पन्ना में सांभर शिकार के मामले पहले भी सामने आ चुके हैं
पन्ना वन क्षेत्र में सांभर जैसे संरक्षित वन्यप्राणियों के शिकार का खतरा पूरी तरह काल्पनिक नहीं है। दिसंबर 2025 में पन्ना जिले के सलेहा वन परिक्षेत्र में बिजली के तार का इस्तेमाल कर सांभर के शिकार का मामला सामने आया था। वन विभाग ने एक आरोपी को गिरफ्तार कर उसके कब्जे से करीब 10 किलोग्राम सांभर का मांस बरामद करने की जानकारी दी थी। विभाग के अनुसार, शिकार के लिए बिजली के तार का अवैध जाल लगाया गया था और मामले में अन्य आरोपियों की तलाश की जा रही थी।
यह पुराना मामला इस बात की ओर संकेत करता है कि पन्ना के जंगलों में वन्यजीवों के खिलाफ अपराध रोकने के लिए केवल संरक्षित क्षेत्र की सीमाएं पर्याप्त नहीं हैं। वन सीमा से लगे सामान्य वन क्षेत्रों, बीटों और वन्यजीवों के आवागमन वाले रास्तों पर भी लगातार निगरानी जरूरी है। केरबन की घटना इसी व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की परीक्षा बन गई है।
जांच में केवल शिकार नहीं, विभागीय लापरवाही भी जांच के दायरे में हो
इस मामले में जांच का दायरा केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं होना चाहिए कि सांभर को किसने मारा। जांच में यह भी तय किया जाना चाहिए कि यदि घटना शिकार की थी, तो शिकारी जंगल में कैसे पहुंचा, गश्ती दल को इसकी भनक क्यों नहीं लगी और घटना के बाद सूचना देने की प्रक्रिया कहां विफल हुई।
वहीं यदि सांभर की मौत बाघ के हमले से हुई है, तब भी यह सवाल कायम रहेगा कि मृत वन्यप्राणी के संबंध में समय पर रिपोर्ट क्यों नहीं बनाई गई। वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था में प्रत्येक असामान्य घटना का रिकॉर्ड रखना, वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित करना और आवश्यक वैज्ञानिक परीक्षण कराना अनिवार्य प्रक्रिया का हिस्सा होना चाहिए।
जांच में इन सवालों के जवाब जरूरी
- क्या 1 सितंबर को घटनास्थल पर तत्काल निरीक्षण किया गया था?
- क्या सांभर के अवशेष सुरक्षित किए गए या उन्हें नाले में फेंक दिया गया?
- क्या अवशेषों का वैज्ञानिक परीक्षण या पोस्टमार्टम कराया गया?
- क्या घटनास्थल से धारदार हथियार, पदचिह्न या अन्य साक्ष्य जुटाए गए?
- क्या केरबन बीट में नियमित रात्रि गश्त हो रही थी?
- क्या गश्ती दल के GPS रिकॉर्ड उपलब्ध हैं?
- चौकीदार और बीट गार्ड को घटना की जानकारी कब मिली?
- रेंजर और एसडीओ को सूचना देने में देरी क्यों हुई?
- डीएफओ को घटना की जानकारी कितने दिन बाद मिली?
- क्या वरिष्ठ अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया?
- यदि यह बाघ का किल था तो उसके वैज्ञानिक प्रमाण क्या हैं?
- यदि शिकार की पुष्टि होती है तो वन सुरक्षा तंत्र की जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
केरबन बीट की यह घटना वन विभाग के लिए केवल एक सांभर की मौत की जांच नहीं, बल्कि पूरे मैदानी सूचना तंत्र और वन सुरक्षा व्यवस्था की परीक्षा है। शिकार की पुष्टि हो या बाघ के किल की, दोनों ही स्थितियों में विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि संवेदनशील वन क्षेत्र में हुई घटना की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचने में इतनी देरी क्यों हुई और भविष्य में ऐसी चूक रोकने के लिए क्या कार्रवाई की जाएगी।
