गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्य प्रदेश के वनविहार राष्ट्रीय उद्यान में उपचार और देखभाल के बाद छोड़ा गया यूरेशियन ग्रिफ़ॉन गिद्ध अब अफ़गानिस्तान के मज़ार-ए-शरीफ़ होते हुए ताजिकिस्तान की सीमा तक पहुँच चुका है। यह गिद्ध पहली बार सतना जिले के एक खेत में निर्जलीकरण (डिहाईड्रेशन) के कारण गिरा हुआ पाया गया था, जहां से उसका सफर शुरू हुआ।


दो महीने चला इलाज, फिर शुरू हुई उड़ान
स्थानीय लोगों की सूचना पर वन विभाग की टीम ने गिद्ध को सतना में उपचार दिया और फिर उसे भोपाल स्थित वनविहार गिद्ध संरक्षण केंद्र में लाया गया। यहां करीब दो महीने तक विशेष देखभाल की गई। शुरुआत में गिद्ध ने खाना पीना बंद कर दिया था, लेकिन जैसे ही उसे अन्य गिद्धों के सामुदायिक बाड़े में रखा गया, उसकी हालत में सुधार आया और वह सामान्य रूप से भोजन करने लगा।
वनविहार के निदेशक अवधेश मीना ने बताया कि गिद्ध को पहले क्वारंटीन किया गया और बकरे का मांस दिया गया, लेकिन जब वह नहीं खाया, तो भैंस के मांस पर स्विच किया गया। इसके बाद उसे अन्य गिद्धों के साथ रखा गया, जिससे वह सहज हुआ और पुनः खाने लगा।

प्रवासी परिंदों की अद्भुत यात्रा
यूरेशियन ग्रिफ़ॉन गिद्ध हर सर्दी में यूरोप और मध्य एशिया से गर्म क्षेत्रों की ओर प्रवास करता है। स्पेन, तुर्की और कज़ाकिस्तान इसके प्राथमिक क्षेत्र हैं, लेकिन कई बार इनका कुछ हिस्सा मध्य भारत तक भी पहुँचता है। यह गिद्ध प्रजाति पुरानी दुनिया के सबसे बड़े गिद्धों में से एक मानी जाती है।
मध्य प्रदेश बना ‘गिद्ध राज्य’
मध्य प्रदेश ने गिद्ध संरक्षण के क्षेत्र में देशभर में पहचान बनाई है। यहां भारत में पाई जाने वाली नौ में से सात गिद्ध प्रजातियां सुरक्षित हैं। पन्ना टाइगर रिजर्व और गांधी सागर अभयारण्य जैसे क्षेत्रों में इनका सुरक्षित घोंसला और प्रजनन होता है।
भोपाल का वनविहार राष्ट्रीय उद्यान न केवल इलाज और पुनर्वास का केंद्र है, बल्कि यह गिद्धों के संरक्षण व जागरूकता का मुख्य केंद्र बन गया है।
गिद्धों पर मंडरा रहे खतरे
गिद्धों की संख्या पूरे दक्षिण एशिया में कम हो रही है। इसका प्रमुख कारण डाइक्लोफेनाक जैसी पशु चिकित्सा दवाएं, भोजन में ज़हर और प्राकृतिक आवासों का विनाश है। ऐसे में मध्य प्रदेश का यह संरक्षण प्रयास एक मिसाल बनकर सामने आया है।
