गणेश पाण्डेय, भोपाल। सीहोर वनमंडल में पदस्थ एसडीओ एल्विन बर्मन के विरुद्ध बहुचर्चित 12 लाख रुपये की रिश्वत मांगने के प्रकरण में विशेष पुलिस स्थापना लोकायुक्त ने मुकदमा चलाने की तैयारी तो कर ली है, परंतु विभागीय अभियोजन की स्वीकृति अब तक अधर में लटकी हुई है। इस विषय में लोकायुक्त महानिदेशक योगेश देशमुख ने वन विभाग के अपर मुख्य सचिव (एसीएस) अशोक वर्णवाल को 2 मई 2025 को पत्र लिखकर अनुमति देने का आग्रह किया था, परंतु डेढ़ माह बीतने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
डीपीसी में चयन की आड़ में अभियोजन टालने की चर्चा
सूत्रों की मानें तो अभियोजन स्वीकृति को जानबूझकर रोका जा रहा है क्योंकि आरोपी एल्विन बर्मन का नाम आईएफएस (भारतीय वन सेवा) में पदोन्नति के लिए होने वाली आगामी डीपीसी (विभागीय पदोन्नति समिति) में शामिल है। आशंका जताई जा रही है कि इस कारण ही उनके विरुद्ध कानूनी प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया जा रहा।

क्या है पूरा मामला
यह प्रकरण वर्ष 2019 का है, जब एल्विन बर्मन इंदौर जिले की चोरल रेंज में एसडीओ के पद पर तैनात थे। स्कूल संचालक की शिकायत पर लोकायुक्त पुलिस ने उनके और डिप्टी रेंजर भगवान बड़ोले के खिलाफ रिश्वत मांगने का केस दर्ज किया था। शिकायत के अनुसार, एसडीओ बर्मन ने विद्यालय की जमीन से संबंधित प्रकरण को निपटाने के लिए 12 लाख रुपये की रिश्वत की मांग की थी। लोकायुक्त टीम ने दो बार ट्रैप की कोशिश की, परंतु एसडीओ द्वारा कॉल रिसीव नहीं किए जाने के कारण कार्रवाई सफल नहीं हो सकी।
बाद में शिकायतकर्ता को एक रिकॉर्डिंग डिवाइस दी गई, जिसके माध्यम से यह प्रमाणित हुआ कि बर्मन ने सत्य साईं चौराहे पर बुलाकर लगभग 45 मिनट तक 12 लाख रुपये की मांग की थी। रिकॉर्डिंग की पुष्टि के बाद लोकायुक्त पुलिस ने बर्मन और अन्य आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया।
रिकॉर्डिंग में रिश्वत की पुष्टि
रिकॉर्डिंग में बर्मन की आवाज स्पष्ट रूप से दर्ज है, जिसमें वह कहते हैं—
बर्मन: “तुम तो बहुत बड़े आदमी हो। हमने तुम्हारे बारे में पता किया है। तुम हमको दो-तीन लाख रुपये देकर केस खत्म करवाना चाहते हो?”
शिकायतकर्ता तिवारी: “नहीं सर, पूरा मामला ही गलत है।”
बर्मन: “जिस जमीन पर तुम्हारी बिल्डिंग बनी हुई है, उसका भाव बाजार में तीन हजार रुपये स्क्वेयर फीट से कम नहीं है। तुमने विभाग की जमीन को मिलाकर करोड़ों की जमीन वैसे ही ले रखी है।”
रिकॉर्डिंग में उनके साथ डिप्टी रेंजर भगवान बड़ोले और अन्य अधिकारी अजमेरा की आवाजें भी सुनाई देती हैं, जो उनकी बातों पर हामी भरते हैं।
लोकायुक्त ने स्पष्ट किया अभियोजन की आवश्यकता
इस मामले में विशेष पुलिस स्थापना लोकायुक्त के महानिदेशक योगेश देशमुख ने पत्र में उल्लेख किया है कि—
“एल्विन बर्मन के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधित अधिनियम 2018) की धारा 7 और भारतीय दंड विधान की धारा 120-बी के अंतर्गत अपराध प्रमाणित है। अभियोजन की कार्रवाई आरंभ करने हेतु अधिनियम की धारा 19(1)(ख) तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 218 के अंतर्गत म.प्र. शासन की अभियोजन स्वीकृति आवश्यक है। कृपया शीघ्र स्वीकृति आदेश जारी कर कार्रवाई सुनिश्चित करें।”
प्रशासनिक चुप्पी पर सवाल
हालांकि इस गंभीर प्रकरण में आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया अपराध प्रमाणित पाया गया है और लंबी जांच के बाद चार्जशीट की तैयारी पूरी हो चुकी है, लेकिन शासन स्तर पर अभियोजन की स्वीकृति रोके जाने से सवाल खड़े हो रहे हैं। चर्चा यह भी है कि शासन स्तर पर कुछ वरिष्ठ अफसर बर्मन को संरक्षण देने की कोशिश कर रहे हैं ताकि उनका कैरियर प्रभावित न हो।
लोकायुक्त की पहल के बावजूद अभियोजन की स्वीकृति लंबित रहना एक गंभीर प्रशासनिक प्रश्न खड़ा करता है। यदि ऐसे मामलों में अभियोजन में देरी होती रही, तो यह न केवल न्याय प्रक्रिया को बाधित करेगा, बल्कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान की साख पर भी प्रश्नचिह्न लगाएगा। अब देखना यह है कि शासन इस मामले में जल्द संज्ञान लेकर अभियोजन स्वीकृति देता है या फिर यह प्रकरण भी लंबित फाइलों की कतार में खो जाता है।
