2025 में 23 वन अधिकारी होंगे रिटायर

नरसिंहपुर वन मंडल में 42 से अधिक प्रकरणों में नियम विरुद्ध पेड़ों की कटाई की अनुमति, पीसीसीएफ ने जांच और आरोप-पत्र के निर्देश दिए; फील्ड अधिकारी अब बचाव की फिराक में

गणेश पाण्डेय, भोपाल। वन विभाग के फील्ड अधिकारियों की मनमानी एक बार फिर उजागर हो गई है। इस बार मामला आदिवासी समुदाय से जुड़ी मालिक-मकबूजा भूमि पर नियमविरुद्ध तरीके से पेड़ों की कटाई की अनुमति देने का है, जिसे केवल जिलाधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में माना गया है। मध्यप्रदेश आदिम जनजातियों का संरक्षण (वृक्ष हित) संशोधन अधिनियम 2017 की धारा 4 के स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद कुछ डीएफओ और एसडीओ स्तर के अधिकारियों ने स्वयं को अधिकार प्राप्त मानते हुए भारी मात्रा में कटाई की इजाज़त दे दी। इस लापरवाही ने अब इन अधिकारियों को गंभीर जांच के दायरे में ला दिया है।

गड़बड़ी का खुलासा ऐसे हुआ

नरसिंहपुर वनमंडल में हाल ही में डीएफओ का तबादला हुआ और नए डीएफओ ने पदभार संभालते ही विभागीय कार्यों की समीक्षा शुरू की। इसी दौरान उनके सामने पुराने मालिक मकबूजा प्रकरणों से जुड़े फाइलें आईं, जिनमें पेड़ों की कटाई की अनुमति दी गई थी। जब कानूनी प्रावधानों से इन अनुमतियों की तुलना की गई तो यह साफ हो गया कि इन सभी प्रकरणों में जिलाधिकारियों की अनुमति नहीं ली गई थी, जबकि नियमों के अनुसार ऐसा करना आवश्यक था।

जांच के दौरान पता चला कि नरसिंहपुर वनमंडल में कुल 42 प्रकरण ऐसे हैं, जिनमें अधिनियम का उल्लंघन किया गया। इन सभी में पेड़ कटाई की अनुमति डीएफओ या एसडीओ स्तर पर दी गई, जबकि प्रकरण मध्यप्रदेश आदिम जनजातियों का संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत आते हैं और उनके अंतर्गत कटाई की स्वीकृति देने का अधिकार केवल जिलाधिकारियों को है।

इन अधिकारियों पर लग सकते हैं आरोप

सूत्रों के अनुसार जिन अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है, उनमें प्रमुख नाम हैं –

  • लवित भारती (तत्कालीन डीएफओ नरसिंहपुर, वर्तमान पदस्थापना वर्किंग प्लान, शहडोल)
  • प्रीति अहिरवार (वर्तमान डीएफओ, अशोकनगर)
  • गोपाल सिंह, एसडीओ
  • सुनील वर्मा, एसडीओ

इन अधिकारियों ने अपने कार्यकाल के दौरान अधिनियम की अवहेलना करते हुए पेड़ों की कटाई के 36 से अधिक मामलों में 2 से 3 करोड़ रुपये के भुगतान तक स्वीकृत कर दिए।

जांच के निर्देश, कार्रवाई लंबित

मुख्यालय स्तर पर मामले के सामने आने के बाद पीसीसीएफ (उत्पादन) एचयू खान ने इस पूरे प्रकरण की जांच के लिए सीएफ सिवनी प्रभारी वी मधुराज को निर्देश दिए हैं कि वे आरोप-पत्र तैयार करें। लेकिन हैरानी की बात है कि इन निर्देशों को जारी हुए एक महीने से अधिक समय हो चुका है, और अब तक कोई आरोप-पत्र तैयार नहीं हो सका है।

इस देरी को लेकर आशंका जताई जा रही है कि कुछ फील्ड अफसर मामले को दबाने की कोशिश कर रहे हैं। जानकारी है कि कुछ अधिकारी पुराने दस्तावेजों पर कलेक्टर से बैकडेट में हस्ताक्षर कराने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि वे अपने निर्णयों को वैध ठहरा सकें।

भुगतान के लिए भी बनाया जा रहा दबाव

इतना ही नहीं, जिन प्रकरणों में नियमविरुद्ध अनुमति दी गई थी, उनमें से कई मामलों में संबंधित हितग्राहियों को भुगतान भी कर दिया गया है। सूत्रों के अनुसार 36 से अधिक मालिक मकबूजा प्रकरणों में 2-3 करोड़ रुपये तक का भुगतान हो चुका है और शेष के लिए फील्ड से भुगतान का दबाव बनाया जा रहा है।

वरिष्ठ अधिकारियों की राय: हो उच्चस्तरीय जांच

एक वरिष्ठ IFS अधिकारी ने बताया कि यह मामला केवल नियमों की अनदेखी नहीं है, बल्कि इससे वन विभाग की साख और नीति दोनों पर सीधा आघात हुआ है। आदिवासी हितों से जुड़े मामलों में इस प्रकार की गड़बड़ी सरकार की घोषित नीति के भी खिलाफ है। उन्होंने मांग की है कि मामले की उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच करवाई जाए, ताकि न केवल दोषियों की पहचान हो सके, बल्कि आगे भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

मुख्यालय की सख्ती: सभी डीएफओ-सीएफ को भेजा गया परिपत्र

इस पूरे घटनाक्रम के बाद पीसीसीएफ खान ने प्रदेश के सभी सीएफ और डीएफओ को परिपत्र जारी कर दिया है। परिपत्र में यह स्पष्ट किया गया है कि:

  • मालिक-मकबूजा प्रकरणों में वृक्ष कटाई की अनुमति का अधिकार केवल कलेक्टर के पास है।
  • पंचायत या अन्य संस्थाओं द्वारा दी गई अनुमति वैध नहीं मानी जाएगी।
  • यदि कोई अधिकारी इस नियम की अवहेलना करता है तो उसे व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी माना जाएगा।

इसके अलावा यह भी स्पष्ट किया गया है कि अधिनियम की धारा 2 के अनुसार, लोक वानिकी अधिनियम 2001 के तहत लगाए गए वृक्षों पर यह नियम लागू नहीं होगा, लेकिन प्राकृतिक वृक्षों की कटाई की अनुमति सिर्फ कलेक्टर ही दे सकते हैं।

वन विभाग में आदिवासी हितग्राहियों के नाम पर नियमों की अनदेखी और अधिकारों का अतिक्रमण अब खुलकर सामने आ चुका है। यदि समय रहते कठोर कार्रवाई नहीं हुई तो यह न केवल प्रशासनिक अनुशासन को तोड़ेगा बल्कि वन अधिनियमों की गरिमा और आदिवासी समुदाय के संरक्षण के प्रयासों को भी धूमिल करेगा।